ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बन दिया,
मजनू बनने चला था, ग़ालिब बना दिया।
हुस्न वालो की शहर में होता है,
चर्चा मेरा एक बेवकूफ के रूप में.
क्यों की मैंने उनको,
उन्हीं का आइना दिखा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आईने में उनको सजते – सवरते


उम्र के फैसले बदल – बदल कर,
निगाहों से देखतें हैं तरस -तरस कर.
आईने में उनको सजते – सवरते,
गलियों में उनको निकलते- मचलते।
मोहब्बत का दर्द सहते – सहते,
देखते हैं गैरों को बस्ते यहाँ।
दंश बेवफाई का कुछ ऐसे मिला की,
जीवन रह गया हाथ मलते – मलते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं


तेरी आँखे ही काली नहीं, ए दिलरुबा,
रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं.
जो भी डूबा हैं इन आँखों की मस्तियों में,
आज तक रो रहे उसके घरवाले हैं.
तेरी राते भीं जगमग करती हैं,
और उनके दिन भी जैसे गहरे अंधियारे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रातों को अंगार जला देंगे


वो चम्पाकली, तेरी आँखों को अपना बना लेंगे,
बस शर्म का पर्दा गिरा दे तू, काजल लगा देंगे।
यूँ ही देखा कर दर्पण, तू सुबह-सुबह उठ के,
नस – नस में तेरे, रातों को अंगार जला देंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहाँ – कहाँ है तिल?


कस के पकड़ लो तुम बालम जी,
मेरी बाहों को.
मेरा मन भटक रहा है,
देख नजारों को.
देखो जरा मेरी कमर को,
कहाँ – कहाँ है तिल?
कब तक रखोगे?
यूँ बस, ओठों पे ओठों को.
क्या – क्या अरमान,
लेके आईं मैं मायके से?
कब तक यूँ जलाओगे?
तुम काठ की हांडी को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत नागिनों का है आभूषण दोस्तों


मोहब्बत नागिनों का है आभूषण दोस्तों,
इन अधरों के पीछे छुपा है गरल दोस्तों।
त्वचा है, निसंदेह इनकी बहुत ही मुलायम,
पर अंदर का दिल, है कठोर दोस्तों।
कितने रोएं हैं काँधे पे सर रख के मेरे,
और कितनों ने मिटाया है अपना जीवन दोस्तों।
नागिन कल भी डसती थी, नागिन कल भी डसेगी,
चाहे जितना भी उनको पिला लो शहद दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जहाँ माँ ही मिठाई भी है


बुलंदियों का नाम है गरीबी,
जो टूटे ख़्वाबों में भी जिन्दा रखती है.
ये ऐसा दर्द है,
जो अमीरों की बस्ती में नहीं,
गरीबों  के साथ रहती है.
जहाँ काटती है,
माँ आज भी अपने पेट को.
अपने बच्चे की भूख मिटाने के लिए.
नौ माह का ये दर्द नहीं,
जो सेव-अंगूरों से मीट जाए.
ये तो वो ममता है, जो
उम्र भर एक फटी साड़ी में पलती हैं.
एक माँ की कहानी है गरीबी,
जो रौशनी में नहीं, मैगज़ीन के कवरों पे नहीं,
टूटी चारपाई, और जुगनू में चमकती है.
जहाँ उबलते नहीं हैं चावल,
बिना हाथ, चूल्हे में जलाए।
जहाँ पकती नहीं है रोटी,
बिना चक्की में जवानी पिसाय।
जहाँ चढ़ती नहीं है, जवानी,
बिना माँ के हाथ से खाये।
जहाँ पचता नहीं पानी भी,
बिना माँ के लोरी सुनाय।
की एक जन्नत सी है गरीबी,
जहाँ माँ ही मिठाई भी है.
ये ऐसी मोहब्बत है यारों,
जो अमीरों की किस्मत में नहीं,
बस गरीबों की झोली में हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार


जो अपनी माँ से प्यार नहीं करते,
वो अपने बच्चों की माँ से प्यार कैसे करेंगें?
और जो अपने बच्चों की माँ से प्यार नहीं करते,
वो क्या अपनी माँ को प्यार करेंगे?

 

परमीत सिंह धुरंधर

नशा


नशा आँखों से होता है,
पर उसका एहसास जिस्म को होता है.
तुम चाहे जितनी दूर हो,
पर हर एक पल में साँसों को तुम्हारा एहसास है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा लहू कब इश्क़ बन गया?


इरादा मुझसे पूछता है जहाँ,
जिसे पता ही नहीं मेरा लहू कब इश्क़ बन गया?
अब किसकी खता कहूं इसे?
तेरी नजरों को ज़माने की शोहरत,
और मेरी नज़रों को तेरी नजर का तीर मार गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर