जवानी उनपे चढ़ी


अर्ज किया है दोस्तों,
की जवानी उनपे चढ़ी,
और बर्बाद हम हो गए.
लुटा हमें उसने जी भरकर,
और जमाने भरके,
गुनाहगार हम हो गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आपन गावं के चिड़िया रहनी


अइसन -वइसन खेल ए राजा,
मत खेल आ तू हमारा से.
आपन गावं के चिड़िया रहनी,
लुटले रहनी कतना खेत बाजरा के.
जाल बिछा के कतना शिकारी,
रहलन हमरा आसरा में.
अइसन घुड़की मरनी,
हाथ मल आ तारन आज तक पांजरा में.
अइसन -वइसन चाल ए राजा,
मत चल आ तू हमारा से.
आपन गावं के खिलाड़ी रहनी,
कतना के पटकनी दियारा में.
ढुका लगा के बइठल रहलन,
कतना चोर चेउंरा में.
अइसन दावं मरनी,
आज तक दर्द उठेला उनकर जियरा में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अजब – अजब सा प्यार हैं


अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
धोखा देते हैं सच्चे को,
और झूठे पे, जान निसार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
कोई कहता शादी,
कागज़ का एक टुकड़ा है.
किसी को मौत तक,
इस लाल जोड़े का इंतजार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
दिल और नज़रों के इस खेल में,
बस अब जिस्मों का व्यापार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धरुंगा तुम्हे मैं प्रिये


जिस दिन धरा पे,
धरुंगा तुम्हे मैं प्रिये,
नभ तक हलचल होगी हाँ.
तारों-सितारों की महफ़िलों का क्या?
कलियाँ भी खिल कर चूमेंगी तुम्हे हाँ.
एक दिन उठूंगा,
मैं दलित-कुचलित,
उठाऊंगा तुम्हे अपनी बाहों में,
चुमुंगा, झुमके इसी महफ़िल में हाँ.
जो हँसते हैं वो हंस ले,
हंसा लें खुद को,
मुझे यकीन हैं,
की एक दिन वो दिन आएगा हाँ.

 

Parmit Singh Dhurandhar

दोनों की जवानी ही ऐसी है


वो बड़ी मशहूर हैं,
मैं बड़ा मगरूर हूँ.
दोनों की जवानी ही ऐसी है,
की नजरें एक – दूसरे पे,
बस जिस्म-जिस्म दूर-दूर है.
जो हसतें हैं Crassa पे,
वो क्या जाने?
हम रातो को कितना मसरूफ हैं.
वो हो गई किसी की,
मगर उनकी पतली कमर पे,
ये दिल आज भी मजबूर है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलखना किसे कहते हैं ?


बेहयाई का ऐसा है दौर दोस्तों,
दिल में कोई और, जिस्म पे कोई और दोस्तों।
हमसे पूछो बलखना किसे कहते हैं ?
जो कल तक मेरी थी, अब किसी और की दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपना सब उतार गईं


दास्ताने-मोहब्बत क्या कहें,
वो सूरते-बाज़ार में बिक गईं.
कुछ ऐसे जिस्म की चाहत थी,
की वो सैकड़ों की बाहों में झूल गईं.
हुस्न के इसी रंग पे,
ख्वाब बिकते हैं.
उनकी साड़ी, काजल पे हमने लुटाएं पैसे,
और वो किसी के पैसों पे,
साड़ी, काजल, अपना सब उतार गईं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार और परवाह


बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमने कबूतरों को छोड़ दिया है


हमने कबूतरों को छोड़ दिया है,
उड़ाना अब छज्जे से.
डोली उनकी उठ गयी,
अब क्या रखा है मोहल्ले में?
मेरा सारा प्रेम-रस ले कर,
वो सींच रही बाग़ किसी का.
हुस्न का ये रंग देख कर,
उचट गया है मन जीने से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत याद आते हो पापा


बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर