सारी रात आज बिहार लिखूंगा


अपनी मोहब्बत का मैं दास्ताँ लिखूंगा
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तेरी कमर को छपरा, वक्षों को सिवान लिखूंगा
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तेरे अधरों को लिट्टी, गालों को चोखा
उसपे इन आँखों को आम का आचार लिखूंगा।
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तुम्हारें पावों को धुरौन्धा, बाहों को पटना,
ढोंढ़ी को अपना मलमलिया बाजार लिखूंगा।
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।

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बिजली बना दी


अंगों-ने-अंगों से टकरा के बिजली बना दी
कम्बख्त फिर जलने से कौन बचता?
सबने कहा की परमित ना जा उसके पास
मगर राजपूत रण से पीछे कैसे हटता?

जवानी है, जवानी है, जवानी है-२
तभी तो निगाहों में कहानी है.
कोई बंद कमरे में सुलग रहा
कोई बहती दरिया का पानी है.

वक्त के भीड़ में तुम्ही बगल गए
हम तब भी, अब भी अकेले हैं.

तेरी आँखे ऐसी, की तनहा शराब हो गयी
तेरे जिस्म पे रेंग के हवा मेरे गावं की
जो मीठी थी, अब आग हो गयी
तू क्या खुद को संभाल रही है और किसके लिए
बिहार में चर्चा है की तू अब जवान हो गयी.

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चिंगारी


मैं लिख रहा हूँ तेरी जुल्फ पे किताब
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे रूप को शराब।
मैं लिखता हूँ तेरी आँखों को अपना अंतिम पड़ाव
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे वक्षों पे विश्राम।
मैं लिखना चाहता हूँ तुझे चाँद और मेरा आसमान
मेरी कलम लिखती हैं तुझे मेरा गावं-मेरा बिहार.

तेरे जिस्म की अंगड़ाइयां तेरी आखों की गहराइयों पे भारी हैं
तू मिल जाए तो आग लग जाए, तू राख में दबी ऐसी चिंगारी है.

तू दिन भर की धुप के बाद की एक चाँद है
तू लिट्टी-चोखा पे आम की आचार है.
तू मिल जाए तो झूम उठे हर राही
तू सतत-अभियान का आखिरी पड़ाव है.

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किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है


किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है
इश्क़ में ये दिल टुटा बहुत है.
तुझे प्यास लगे तो लहू से भी मिटा देंगे
मेरी जिंदगी में प्यास बहुत है.
जिस्मानी सुखों का अंत नहीं
राहे-दिल में भी दुःख बहुत है.
मुस्कुराता नहीं हूँ, ये शिकायत है उन्हें
की इन लबों ने नमक पीया बहुत है.
जमाने की नजरों में पिछड़ा होगा बिहार
मगर उस जमीन पे खुशियां बहुत हैं.
यकीं ना हो तो घर बसा के देखो बिहारी का
वहाँ के ससुराल में सुकून बहुत है.
यूँ ही नहीं कहते हैं हमें बाबूसाहेब
छपरा-सीवान, पटना तक हमारा रोआब बहुत है.
हम अब भी ज़िंदा हैं उसे यकीन नहीं होता
इश्क़ में हमें जिसने रुलाया बहुत है.
हमें उतरा बीच हाइवे पे दोस्तों ने ही कार से
मगर बेचनेवालों को भी खुदा ने बनाया बहुत है.
हमने किसी को थमा नहीं उसके ठुकराने के बाद
उसने भी ज़माने को नचाया बहुत है.
उम्मीदों के समंदर में सब है बस वो नहीं
जिसके किनारों पे हमने घर बनाया बहुत है.
जिंदगी की तलाश में कुछ भी नहीं तरस पाएं
इस मुकाम पे भी ये मलाल बहुत है.

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वो दवा पिलाती भी हैं तो भाईजान कहके


दरियावों को किनारों की चाहत नहीं होती
समंदर तक आते-आते वो आग नहीं होती।
तू घमंड में जिसे पाकर, इतहास हैं उसका,
वो किसी की नहीं होती।
हम बिहारी हैं, नाप लेके हैं आँखों से आकार का
हम सी दें चोली तो वो छोटी नहीं होती।
तू जिसे चाहे चुन ले, तेरा अधिकार है
सबका ससुराल बिहार हो ऐसी किस्मत नहीं होती।

कितना तोड़ोगे हमको नजरों को चुराकर हमसे
हम तो पहले ही टूटे हैं दिल को लगा कर तुमसे।

इश्क़ में तुम्हारी गली का नजराना बहुत है
और इश्क़ में हमारी गली में मयखाना बहुत है.
तुम्हे मिलता है सबकुछ बिना पुकारे
हमारी पुकारों में बस तेरा नाम बहुत है.

कातिल की नजर को सलाम करके
हम बैठ गए है इश्क़ में नाकाम होके।
दर्द भी बता दें तो क्या भला
वो दवा पिलाती भी हैं तो भाईजान कहके।

A sip


I am taking alcohol as I can not take you
I am sipping it slowly as I can not do deep in you
The whole world is meaningless if ours legs don’t hold each other
I am jerking as I cannot jump on you.

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तरंगिणी हो


ह्रदय की तुम स्वामिनी, मेरे मन में विराजी हो
चंचल नयनों से वेधती, हर पल मेरी साँसों की वेदी हो.
सरिता सी नित बह रही, कुरेदती हो पाषाण को
टूट-टूट, बिखर रहा मैं नित, तुम प्रबल-प्रखर-प्रचंड, तरंगिणी हो.
तुम्हारे मतवाले नयनों की चाल, जैसे अरण्य में स्वछंद विहरति मृगनी हो.

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बेवफा


नजर की ख्वाइशें नजर में रह गयी
जो दिल में दबी थी वो दिल में रह गयी.
हम पीते रह गए जिसकी याद में
वो सब मिटा के डोली चढ़ गयी.
कुछ भी नहीं इश्क़ में एक धोखा के सिवा
और बेवसी देखिये की बेवफा को कलम वफ़ा लिख गयी.

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Dew


I want to be with you
Make me your morning dew.
You are green like grass
I want to be on top of you.

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नजर की ख्वाइशें


नजर की ख्वाइशें, नजर में रह गयी
जो दिल में दबी थी, वो दिल में रह गयी.
हम पीते रह गए जिसकी याद में
वो सब मिटा के हाँ, डोली चढ़ गयी.
कुछ भी नहीं इश्क़ में एक धोखा के सिवा
और बेबसी देखिये की बेवफा को
कलम वफ़ा लिख गयी.
सोचा की दिल को संभल लेंगे, दिल को
संभाला ही था की वो फिर सामने दिख गयी.

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