हर रात जब डूबना ही है


बिखर जाती है काजल,
जब भी डालूं आँख में.
क्या बांधू गजरा,
कैसे इन जुल्फों में.
हर रात टूटती हैं,
मेरी ही आगोस में.
चूड़ी, कंगन और झुमके,
सब उदास है.
कितना भी सम्भालूँ,
इन्हे.
चोर ले ही जाता है,
हर रात उतार के.
जल रहा है दर्पण,
मेरे विरहा की आग में.
कई मास बीते यूँ ही इसकी,
बिना निहारे अंगो को मेरे.
क्या सजाऊँ इनको,
किसी खुसबू से.
हर रात जब डूबना ही है,
इनको फिर पसीने में.

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


दिल धड़क – धड़क के कह रहा है,
मैं समंदर को मथ दूँ.
तू घूँघट तो खोल एक बार बस,
मैं सब कुछ आज अपना बेंच दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

चुम्बन


समंदर ही रूठा हो तो क्या ढूंढे किनारा कोई,
मयखाना आज तक है प्यासा, पैमाने टूटे कई.
एक चन्दा के पीछे हैं तारे कई,
चाँद फिर भी अकेला, न मिटा सका दाग कोई.
फूलों से भौरों का रिश्ता क्या समझेगा भला कोई,
एक चुम्बन के पीछे मिलते है दर्द कई.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी – मौत


तेरे दो नैनों के समंदर में,
कितनों के नाव डूबें हैं.
बस ओठों तक आने दे मुझे,
फिर जिंदगी – मौत, सब झूठे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

कभी दरिया उछलती हो


कभी तेरे आँखों का समंदर हो,
कभी मेरी बाहों का किनारा।
कभी दरिया उछलती हो,
कभी डूबा हो किनारा।
कभी दूर गगन पे हो तारें,
कभी दिए से हो उजियारा।
कभी तेरी आँचल से बांध कर कटे,
कभी रातें हो तेरी जुल्फों का साया।
कभी यूँ ही,
आलिंगन हो ओठों को चूमकर,
कभी हो दूर से,
शर्म से बोझिल आँखों का सहारा।

परमीत सिंह धुरंधर

धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें


जब तुम खामोश हो जाती हो,
मेरी बाहों में आकर।
हर थकान मिट जाती है,
तुम्हारी साँसों को छूकर।
यूँ ही गुजरती रहें रातें,
बिना कुछ कहे – सुने।
बस तेरी झुकी पलकें हों,
और मेरी गर्म साँसे।
मुद्दत तक हो यूँ ही बरसात,
की डूब जाए हर खेत और खलिहान।
यूँ ही सुलगती रहे, ये आग चूल्हे की,
न रोटी पके और न जले,
बस धुंओं से धुंधला, तेरा जिस्म हो,
और धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें।

परमीत सिंह धुरंधर

चादर


दर्पण को कैसे निहारूं,
उनपे वो रंग अब तक है.
जो दे गए थे तुम,
वो जखम, दर्द एक साथ सब संग.
कोई रिस्ता नहीं गढ़ पाती,
वो तेरी चादर एक बुनकर,
जिस पे सोये थे तुम कभी,
साँसों के समुन्दर में बहकर मेरे संग.

परमीत सिंह धुरंधर

नयापन


एक नयापन,
जीवन में लेकर जो तुम आई हो.
मेरे सागर के खाड़ेपन को,
हर पल में हरती हो.
मेरे अंबर के सूनेपन पे,
तुम चाँद सी जब खिली हो ,
फिर जीवन में मेरे क्या कमी है.

परमीत सिंह धुरंधर

अधरों पे आग


मैं अपनी जुल्फों में बांधकर उनको,
जो इतराई,
वो मेरी नस – नस को झनका गए.
मैं ह्रदय चुराकर जो संवरने लगी,
वो दर्पण को सौतन मेरी बना गए.
प्यासा बनाकर, उनको जो छोड़ा मैंने,
वो बाबुल को मेरे पराया बना गए.
रुलाया जिसको इश्क़ में जी भरकर मैंने,
वो अधरों पे मेरे आग जला गए.

परमीत सिंह धुरंधर

संघर्ष और चाहत


संघर्ष ही जीवन का मिठास है, दोस्तों,
हर नदिया प्यासी, सागर के खाड़ेपन को.
चकोर की चाहत वो चाँद दूर का,
जिसके आँगन में सितारे और दामन में कई दाग हैं।

परमीत सिंह धुरंधर