तुम क्या समझोगे मेरी असमंजस को,
हर सितम में बस तुम्हारी ही तमन्ना है.
परमीत सिंह धुरंधर
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तुम क्या समझोगे मेरी असमंजस को,
हर सितम में बस तुम्हारी ही तमन्ना है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो शाम सी ढली,
और खो गयी,
रात के अंधेरो में,
की हम फिर मिल न सके.
उसे जिद्द था मुझसे दूर जाने की,
मुझे गुरुर था उसके निगाहों की,
उसकी मोहब्बत में,
बनकर तारा यूँ मैं टूटा,
की फिर कभी ये जुदाई मिट न सकी.
परमीत सिंह धुरंधर
इन काली-काली आँखों में,
मैं काजल बनके बस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ चंदा-तारें ले आऊँ.
कभी बादल बनके बिचरूँ,
इन उड़ती-उड़ती तेरी जुल्फों में.
फिर कभी छम-छम करके बरसूँ,
तेरे उन्नत-उन्नत बक्षों पे.
तेरी गोरी-गोरी काया पे,
चन्दन सा मैं घिस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ हल्दी-उबटन लगाऊँ।
परमीत सिंह धुरंधर
आज जब रोता हूँ तो आँसूं नहीं निकलते हैं.
जब आँसूं निकल रहा था, मैं रो नहीं रहा था.
परमीत सिंह धुरंधर
The girl with the newspaper,
took my heart forever.
In the moving train,
first time,
I felt the heart-pain.
That night, I dreamed a lot,
because, she was so hot.
With black eyes,
and long hair,
took my heart forever.
The girl with the newspaper,
took my heart forever.
Parmit Singh Dhurandhar
प्रेम: मुझ इस बात का अफ़सोस नहीं की तुम मुझसे प्यार नहीं करती। बल्कि इस बात की ख़ुशी है की तुम बिना प्यार के भी मेरे साथ रहती हो.
प्रेमा: मैं इसलिए तुम्हारे साथ नहीं रहती की तुम्हे ख़ुशी मिले, न ही मैं इसलिए तुम्हे छोड़ के नहीं जा रही की तुम्हे दुःख होगा। मैं इसलिए तुम्हारे साथ हूँ क्यों की मैं जिंदगी को समझती हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
दिल कब का टूट कर, समुन्दर में बह गया,
वो अब तक दरिया में प्यार ढूंढती हैं.
इश्क़ का मेरा चूल्हा, जल कर कब का बुझ गया,
और वो अब तक सिलवट पे सरसो पिसती हैं.
निगाहों में उनके हैं कितने ही परदे,
कोई हाय, शर्म, लज्जा तो कोई मोहब्बत कहता हैं,
जब भी देखता हूँ इन पर्दों के अंदर,
बस सोना, चांदी और पैसों का चमक दीखता हैं.
कौन कहता है की मोहब्बत दिलवालो का खेल हैं,
आज भी उनका दुपट्टा कहीं और,
तो कमीज, कहीं और ही सिलता है.
परमीत सिंह धुरंधर
अगर ब्रह्मचर्य से ही परमानन्द की प्राप्ति होती, तो खच्चर यूँ धरती पे बोझ न ढोता। और, अगर एक नारी एक नारी का दर्द समझ सकती तो टाइगर वुड्स को दुबारा प्यार नहीं प्राप्त होता।
परमीत सिंह धुरंधर
प्यासा, प्यासा, प्यासा, प्यासा हूँ,
तेरी चाहत में एक तमाशा हूँ.
गैरत मेरी, तो कब की खो गयी,
अब तो बस, एक चाय का प्याला हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
ललुआ भइल, भलुआ भइल,
पर बारु अभी भी कमाल के.
आव अ न रानी, खाल अ ना रानी,
मरई में, आज हमरा साथ में.
आँगना में त अ ओसा पड़ी,
आग ई ले जा, तू आज, बथान से.
पोता भइल, नाती भइल,
पर लागेलू अभी भी सोलह साल के.
आव अ न रानी, बैठ अ ना रानी,
कम्बल में पाँव डाल के.
आँगना में त अ ओसा पड़ी,
आग ई ले जा, तू आज, बथान से.
परमीत सिंह धुरंधर