तेरे अंगों पे कहीं पटना,कहीं छपरा तो कहीं सीवान दीखता है


तू मुस्कराये तो पुरे के पुरे मानचित्रा पे
पूरा -का – पूरा बिहार दीखता है.
तुम्हारे मम्मी -डैडी पूजनीय ही नहीं
सिर्फ मेरे लिए भगवान् ही नहीं
तुम्हारे मम्मी -डैडी, दादा-दादी, भाई-बहन
उनमे पूरा -का-पूरा ससुराल दीखता है.
तू शर्माए तो वो सर्दी की रात
वो बोरसी की आग
और उसमे पकता वो लिट्टी दीखता है.
तेरे नयन जैसे मेरे गावँ के पोखर
तेरी कमर, जैसे चलनी में चोकर
तेरी कमर पे झूलती ये चोटी
पीपल पे वो मेरा झूला दीखता है.
तू पूरी -की-पूरी मुझे मिल जाए
तो मुझसे धनवान कौन, बता?
की तेरे अंगों पे कहीं पटना,
कहीं छपरा तो कहीं सीवान दीखता है.

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तिल


मैं प्यासा हूँ
मेरी प्यास मिटाने को मिल.
खूबसूरत अंग लिए हो तुम
इन अंगों पे मेरे रंग चढ़ा के मिल.
मैं गिनता रहूं रात भर तेरे जिस्म के तिल को
तू एक रात तो दिया बुझा के मिल.

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यार की आँखों में इतनी आदाएं हैं


तन्हा-तन्हा कर देंगे इशारों में, यार की आँखों में इतनी आदाएं हैं
हम कैसे संभाले खुद को इन राहों में, यार की आँखों में इतनी आदाएं हैं.
अरे बिजली गिरा दे यूँ ही हंस के बातों में, यार की आँखों में इतनी आदाएं हैं
तन्हा-तन्हा कर देंगे इशारों में, यार की आँखों में इतनी आदाएं हैं.

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माँ की निगाहों में है


फ़िज़ाओं में रौशनी सितारों से नहीं, दुआओं से है
मेरी राहें-मंजिल मेरी माँ की निगाहों में है.

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मोहब्बत मेरी एक इबादात है


एक तू ही नहीं है और भी हैं यहाँ
इनके लिए सज-संवर के है धरा.
दिल तोड़ो ना कभी किसी का
हर दिल में बैठा है खुदा यहाँ।
मोहब्बत मेरी एक इबादात है
ना मानते हैं वो, ना ही माने खुदा।

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मिलन


भीड़ में भी तन्हाई का सफर होता हैं
बिना मिले जिस्म के भी मिलन होता है.

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मोहब्बत


जो मिल रहे हैं तुझसे वो तेरे अपने है क्या
जो दूर हैं वो देख रहे तेरे सपने है क्या?
मैं नहीं तो तू नहीं, तू नहीं तो मैं नहीं,
बस ये ही एहसास है मोहब्बत
इसके आलावा भी कोई मोहब्बत है क्या?

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करीब


वो मिली और बैठी इतने करीब में
तन्हाई लिख गयी ताउम्र मेरे नसीब में.
दरिया कब हुई है किसी किनारे की?
मगर डूबते हैं वो इसी यकीं में.

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हक़


अब बारिशों का मौसम वैसा न रहा
रूह, रूह न रही, दिल, दिल न रहा.
सुखाता नहीं हूँ जिस्म को अब भींगने के बाद
दुप्पटे पे उनके मेरा हक़, अब वो हक़ न रहा.

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बनारस


तेरा मुस्कराना, अब वो मुस्कराना न रहा
तेरा दीवाना, अब वो दीवाना न रहा.
तूने रचाई मेहँदी ऐसे किसी के नाम की
बनारस बसने का मेरा इरादा, इरादा न रहा.
हसरतों को ऐसे दफना गयी वो मेरे
फाइलों को चूमने का कोई बहाना न रहा.
उन्हें ही देख के सजाता था वीरान ठिकाने को
उन्हें देखने का वो अब अपना ठिकाना न रहा.

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