दुनिया मेरी, सिक्के मेरे, कुछ भी मेरा न चला
वो कभी फिर ना मिली, कुछ भी फिर न मिला।
तड़पता रहा उम्र भर मैं, दर्द ही ऐसा लिया
दवा कोई, दुआ कोई, कुछ भी असर ना मिला।
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दुनिया मेरी, सिक्के मेरे, कुछ भी मेरा न चला
वो कभी फिर ना मिली, कुछ भी फिर न मिला।
तड़पता रहा उम्र भर मैं, दर्द ही ऐसा लिया
दवा कोई, दुआ कोई, कुछ भी असर ना मिला।
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हुस्न ढला, तो वो घर बसा गयी
दिल टुटा तो मुझे अक्ल आ गयी.
ना रहा भेद जरा भी ख़ुशी और गम में
जिंदगी ऐसे-ऐसे रंग दिखा गयी.
दोस्त कह कर वो ले गए महफ़िल में
वहाँ उनको दुश्मनी याद आ गयी.
वो मिली तो मुझे जान, जानू, दुनिया बना गयी.
सब बना के, शौहर किसी और को बना गयी.
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गरीबी और आशिकी ने वो मंजर दिखा दिया
जन्नत सी दुनिया में जहन्नुम दिखा दिया।
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वो मिली तो मैं ढह गया भरभरा कर
इंतज़ार में जिनके खड़ा था एक दीवार बनकर।
मांगू भी तो खुदा बता उन्हें अपने लिए अब कैसे?
वो लौंटी तो हैं, पर किसी से सात-जन्मों का रिश्ता जोड़कर।
सदमा देकर दिल को वो मुस्कराने लगी हैं खुलकर
लौटीं हैं जब से किसी को अपना शौहर चुनकर।
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परिंदो के पर नहीं होता
बिना परों के परिंदा नहीं होता।
हुस्न बेवफा होता है इश्क़ में
बिना बेवफाई के इश्क़ नहीं होता।
बरसों लगे उन्हें बाहों से सेज तक आने में
यूँ ही कोई सफर लम्बा नहीं होता।
मत पूछ मुझसे मेरे दर्दे-जिगर का हाल
अब मुझसे वो बयां नहीं होता।
छिड़ जाता है जब भी जिक्र उनका
महफ़िल में फिर मुझसे पीया नहीं जाता।
कब किसने किसको संभाला है यहाँ
माँ सा दूजा कोई नहीं होता।
वो साथ चले तो वक्त का पता नहीं चला
अरे वेकूफ़ी में वक्त का इल्म नहीं होता।
तुम नजर मिला लो तो इश्क़ हो जाए
बिना इस दर्द के अब गुजरा भी नहीं होता।hay
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मेरी जान मोहब्बत में
कई रात रोया हूँ.
टुटा हूँ हर रोज खुद में
पर भूल ना पाया हूँ.
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ना जुल्म कर इतना
की ये दिल है, जिस्म नहीं।
बस एक मुलाकात मांगी है
तेरा जहाँ नहीं।
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गगन को मगन करके
बादलों में दामनी को चंचल करके
सावन की ये काली घटायें
धरा पे मृग, मोर, पुष्प को
प्रेम से पुलकित कर रहे.
भ्रमर को भ्रमित करके
नवयौवना के ह्रदय को झंकृत करके
सावन की ये काली घटायें
बरसो की विरह को नवरस
से पराजित कर रहे.
दूर बस तुम्ही हो मेरे साजन।
दिन साल हुए, साल विशाल हुए
तुम जाने किस मोहनी के मोह में
मेरी साँसों को निष्प्राण कर रहे.
नसों में नशा उतारू तो क्यों?
अधरों पे प्यास बसाऊं तो क्यों?
उर्वरित धरा को जब तुम
बीज-रहित रख रहे.
सावन की ये काली घटायें
तुम्हारे बाजुपाश-रहित
मेरे मन को व्यथित कर रहे.
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सरेआम दिल को ठुकरा कर वो जा रहे हैं मुस्कराकर
ना रहीं अब ख्वाइशें, ना रहा कोई ही भरम.
लिख भी दूँ तो क्या लिखूं, ये कलम -दवात बता?
लिखने से भला कब मिटा हैं किसी के दिल का दरद?
थाम रहीं हैं मेरे सामने ही वो किसी की बाहों को
जाने कैसे ज़िंदा हूँ, ना हट ही रही उनसे नजर.
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Hey Galib, what have you been writing
on her beauty?
Whatever it it, it is about my heart.
The whole world know my pain
and the reason of it.
However, only you are writing the cure of it.
Hey Galib, which path should I choose,
I dont know?
Because, on each path,
you have been writing her home address.
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