दर्द ही अगर जिंदगी है तो मोहब्बत खुले आम कर,
शौक ही अगर तेरा यह ही है तो बेवफाई का न गम कर.
हौसले अगर पस्त ना हुए हो तेरे तो बढ़ा चल, बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
खूबसूरत चेहरे चाँद से और आँचल उनका बादल सा,
बरस गए तो किस्मत तेरी वरना नए मानसून का इंतज़ार कर.
शहीद हुए कितने इन राहों में कौन आंसू बहता है,
मौत से जो निर्भय है वो ही हुस्न से दिल लगता है.
बेवफाओं की इस बस्ती में कितने उजड़ गए,
किस -किस का जिक्र करें और कहाँ -कहाँ करें।
तू अपनी सोच, मंजिल पे नज़र रख, बढ़ा चल-बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
परमीत सिंह धुरंधर