सौतन के सेज पे


जोबन चढ़ल, नयना मिलल
चुनर उड़ल, चूड़ी टूटल
राजा जी तहरे ही खेत में.
ललुआ भइल, भलुआ भइल
भइल सारा खेला
राजा जी रउरे ही खेत में.
छोड़ के फिर आपन खेत
बइठल बानी कौना, सौतन के सेज पे.

परमीत सिंह धुरंधर

तार-तार करेला


सैया न, बड़ा खेल खेलेला
कभी धुप, कभी छावं करेला।
एगो त चोली बाटे देह पे
ओकरो के तार-तार करेला।

परमीत सिंह धुरंधर

Definition of marriage


What is the perfect marriage?
When there is no difference between day and night.

Parmit Singh Dhurandhar

एक बिंदी बन के


प्रेम कितना विवश कर देता है
दो नयनों से ह्रदय को हर के.
वो तो रख लेती हैं उपवास
हम रह जाते हैं बस एक चाँद बन के.

वो चलती हैं सज के – संवर के
बाँध के साड़ी अपनी कमर से.
हम रह जाते हैं बस
उनके माथे की एक बिंदी बन के.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की बैठकी


मुझे छोड़ गए बलमा
एक प्यास जगाकर।
सुलगती रही सारी रात
मैं एक आस लगाकर।

काजल भी न बहा
न टुटा ही गजरा।
उड़ गया वो भौंरा
अपनी जात बताकर।

कोई संदेसा पीठा दो
उस हरजाई Crassa को.
न ऐसे छले
हाय, दिल लगाकर।

जाने क्या मिलता है
छपरा की बैठकी में.
की भूल गए तुम हमें
अपनी लुगाई बनाकर।

परमीत सिंह धुरंधर

दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

न करे खर्च एक रुपया


काला – काला सैया मेरा
जैसे कोई कउआ.
दिन भर करे टर्र – टर्र
रात में चढ़ा के पउआ.

दुःख का पहाड़ टूटा है सखी
जाने क्या देख, बाबुल बाँध गए पल्ला?
मेरी भारी जवानी पे
न करे खर्च एक रुपया।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे


उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.

कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 2 (पत्नी और उसकी बिछड़ी बहन)


रश्मि, “क्या जी आज कल किसके साथ लगे रहते हो फ़ोन पे. घर पे कोई तुम्हारे साथ है, उसपे भी कोई ध्यान दे दो.”
मैं, “अरे ध्यान तो तुम ही नहीं देती। जैसे भी रात होती हो, तुम तो अपने दर्पण की बाहों में चली जाती हो.”
रश्मि,”सुनो, मैं सही में पूछ रही हूँ. कौन है, किसके साथ तुम ये बात करते हो? मैं अपने जीवन में कोई और किस्सा नहीं चाहती।”
मैं, “हंस कर अरे तुम भी ना. अरे ये कोई नहीं, सुजाता है.”
रश्मि ने पहली बार दर्पण को छोड़कर, मेरी तरफ मुड़कर अपनी दोनों आँखों से सीधे – सीधे देखते हुए पूछा की ये सुजाता कौन है, और मैं कब मिला।
मैं भी अचंभित की क्या हो गया इसको।
मैंने पता नहीं क्यों बिना मज़ाक किये या बात को बढ़ाये ही उसे बताना उचित समझा की सुजाता कौन है. शायद एक साल के साथ के बाद हर पति समझ जाता है की पत्नी को ना छेड़ा जा सकता है न ही उससे मज़ाक किया जा सकता है. तभी तो घर के बाहर कोई चाहिए एकांत में छेड़खानी के लिए. शादी के बाद के अवैध संबंधों का ये ही कारण है.
मैंने कहा, “अरे तुम्हारी छोटी बहन, मेरी साली सुजाता।”
दो मिनट की मौन के बाद सायद उसे एहसास हो गया की मैं क्या सोच रहा हूँ.
उसने कहा, “अरे तो सीधे बोलो न की मेरी बहन से बात करते हो. यहाँ तो हर गली – गली में कितनी सुजाता होंगी। और इतना क्या रोज – रोज मेरी बहन से बात करोगे, की मैं समझ जाऊं। मुझे तो अभी भी शक है और सुजाता ने मुझे तो तभी तुम्हारी कोई कही बात नहीं बोली की मैं शक ना करूँ।”

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

रश्मि, “सुनो, आज तुम्हारी सुजाता से बात हुई थी या आज कल बंद है.”
मैंने, “हुई थी बाबा, वो रोज मुझे दफ्तर में भी कॉल कर देती है, अगर मोबाईल पे रिप्लाई न दूँ.”
रश्मि, “लेकिन आज मुझे दो घंटे बात हुई. मैंने कितनी बार तुम्हारा नाम लिया। कितना उससे पूछा, कितना तुम्हारे बारे में मैं बोली। उसने तो कुछ भी नहीं कहा.
मैं, “अरे मुझे क्या पता, तुम बहनों में क्या है?”
रश्मि, “मुझे अपना फ़ोन दो और उसका नंबर दिखावो, मुझे पूरा यकीन हैं ये सुजाता शायद मेरे कुम्भ के मेले में बिछड़ी बहन है. मुझे भी अब उससे मिलना है.”
मैंने पुरे आत्मविश्वास के साथ सर झुका कर फ़ोन उसको सौंप दिया।
पूरी जॉंच – पड़ताल के बाद फ़ोन मुझे सौंपते हुए रश्मि बोली, “चाय पीनी है.”
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो रसोई की तरफ जाती बोली, “पकोड़े भी बना देती हूँ, बहार ठण्ड हैं.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

नौ – महीने में दे दूंगी एक लल्ला तुझको


शादी हो गयी बेबी की,
तो बेबी बोली, ऐ विक्की।
चल मना लें हम हनीमून,
शोर – शराबे से कहीं दूर.

मेरी कमर पे हो तेरे बाज़ू,
तेरी साँसों पे हो मेरा काबू।
सुबह – शाम के चुंबन के साथ,
चलेगा गरमा – गरम चाय पे चनाचूर।

मेरी जवानी ढल जाए,
उसके पहले संभल ले,
मैं उड़ जाऊं, उसके पहले बाँध ले.
नौ – महीने में दे दूंगी एक लल्ला तुझको,
खिला – खिला के लड्डू मोतीचूर।

 

परमीत सिंह धुरंधर