सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।
परमीत सिंह धुरंधर
सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।
परमीत सिंह धुरंधर
रतिया तहरे से हाथ लड़ा के,
चूड़ी-कंगन, हँसुली हेरइली।
अइसन जीत के का करीं,
जब अकेले हम हीं आपन थाती लुटाइली।
परमीत सिंह धुरंधर
सैयां तहरे जवानी के किस्सा रहल,
जो कचहरी में चलल रहल.
पंच-प्रमुख भी का करियन तहरा के,
उनकरो घरे त ताहर काँटा फसल रहल.
बड़ा कइलअ तू मनमानी राजा जी,
गाउँवा में सबके बनइलअ तू नानी राजा जी.
छोड़अ अब ई सब धंधा हमरो पर धयान द राजा जी,
अब संभालअ तू आपन घर और दुआर राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
ये दुश्मनी का नया दौर है,
मोहब्बत में इलज़ाम लगाना,
अब शौक है.
कल तक रोती थीं जो मेरी,
पहलु में आने को.
आज मेरी पहलु से जाने,
को बेताब हैं.
एक रात के लिए जो,
अब्बा-अम्मा से लड़ गयी.
एक रात भी अब नहीं गुज़ारेंगी,
ये कह के मुख मोड़ गयीं.
ये वक्त का नया दौर है,
हर रात एक नया शौक है.
बहती गंगा में कौन नहीं हाथ धोता,
आज हुश्न से बड़ा गंगा कौन है.
ये अंदाजे-रुख का नया दौर है,
सबको फ्रेंडशिप का शौक है.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत है जो ह्रदय,
वो सजता-सवरता ही नही.
सजने-सवरने वालों में,
कोई ह्रदय ही नहीं.
मैं कल भी चूड़ी लाया था,
मैं आज भी कंगन लाया हूँ.
आइना भी इंतज़ार में बैठा है,
चूल्हा है की भुझता ही नहीं.
सुबह थक कर चली गयी,
रात ऊब कर ढल गयी.
गजरा भी अब सुख गया,
बेलन-चौकी उनकी थकती ही नही.
परमीत सिंह धुरंधर
ये मत पूछ की वो कितने रात मेरे पास थीं,
ये पूछ की जब वो साथ थीं तो कैसी रात थी.
न खुद सोयी न मुझे सोने दिया,
सारी रात वो चुप थीं, और मैं भी खामोश था.
दिन – भर जो पहनती थी इठला -इठला कर,
रातों को मैंने, सोना-पीतल सब झाड़ लिया.
ये मत पूछ की मैंने कितने रात लूटें सोना-चांदी,
ये पूछ की मैंने क्या -क्या नहीं लुटा.
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
वो रात भर मेरी बाँहों में,
रक्त का संचार बनी,
मेरे हृदय कि धड़कने,
मेरी साँसों कि रफ़्तार बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
उड़-उड़ के उनकी जुल्फे,
गिरती हैं मेरे मुखड़े पे,
आँचल ढाल कर उनके काँधे से,
लिपटा है मेरे सीने से,
मासूमियत से दूर,
वो मेरी मुस्कान बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
अधखुली पलकों से,
वो देखती हैं मेरे तन को,
अभी भी दबी,
अपने सरमोहया के बोझ से.
उनके योवन कि खामोसी,
मेरी जवानी कि चीत्कार बनी.
पल में वो दूर जाती,
पल में पास आ रही,
अपनी जुल्फो कि उलझन से,
खुद उलझती जा रही.
उनकी ये विवसता,
मेरा राजपूती अहंकार बनी.
न रोसनी कि चाहत,
न उची उड़ान कि,
लगता हैं प्यारा अब ये अंधकार,
उनकी जुल्फे मेरी पाश बनी,
लो टूट रहा मेरा ब्रह्मचर्य परमीत,
वो मेनका-अवतार बनी.