मुसाफिर की किस्मत में,
माँ का सुख कहाँ?
लड़कियों की चाहत,
ताउम्र सफर की,
उनका एक मुकाम कहाँ?
जो मान लेते हैं,
झटपट अपने बेगम की हर ख्वाइस।
ऐसे शौहर को क्या पता?
की बेगम के शौक क्या -क्या?
और नजरें कहाँ – कहाँ?
परमीत सिंह धुरंधर
मुसाफिर की किस्मत में,
माँ का सुख कहाँ?
लड़कियों की चाहत,
ताउम्र सफर की,
उनका एक मुकाम कहाँ?
जो मान लेते हैं,
झटपट अपने बेगम की हर ख्वाइस।
ऐसे शौहर को क्या पता?
की बेगम के शौक क्या -क्या?
और नजरें कहाँ – कहाँ?
परमीत सिंह धुरंधर
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने खेत थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने बैल थे.
हाँ, मैं भी मजदूर था,
जब मेरे अपने बाग़ थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरी दुकानें,
मेरे खलिहान थे.
अब तो मैं बस एक बंजारा हूँ.
चूल्हा जलता था,
हाँ दिए की मद्धम रौशनी में.
रोटी पकती थी,
वो बंट जाती थी,
आते – आते अपनी थाली में.
मगर,
आती बड़ी मीठी नींद थी,
पछुआ के उस ताप में,
माँ के उस थाप में.
अब तो व्यंजनों का भण्डार है,
हर थाली में जैसे एक त्योंहार है.
मगर अब छोटी रातें,
और लम्बी थकान हैं.
मैं एक मजदूर था,
जब माँ सोती नहीं थी,
माँ, एक – एक रूपये का तह लगाती थी.
आज, मैं सिर्फ एक मजबूर हूँ,
जब तहखानों में रूपये है,
मगर माँ नहीं है,
और बीबी उठती नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
हर मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है, वरना वो मोहब्बत, मोहब्बत न होकर, वासना, काम, लोभ और प्रतिशोध बन जाता है. इसलिए तो माँ सर्वश्रेष्ठ है देवों से भी, क्योंकि माँ गलती या पाप होने पे भी उसकी सजा नहीं देती। माँ तो गले लगाती है फिर भी. लेकिन, देवता देते हैं, भाई! ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, चाहे पिता, भाई, बहन, दादा, दादी या गुरु का ही रिश्ता हो, जो बिना ममता के बहुत दिनों तक जीवित रह सके!
परमीत सिंह धुरंधर
त्रिदेओं से बड़ी है ममता तेरी,
ये माँ तू ही है विधाता मेरी।
मैं यूँ ही तेरी चरणों में जीता रहूँ,
तू खिलाती रहे, मैं खाता रहूँ।
तेरी आँचल में हैं जन्नत मेरी,
तुझी से है दुनिया मेरी।
तू यूँ ही मुझे संभालती रहे,
मैं मुस्काता रहूँ, मैं हँसता रहूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
जी रहा हूँ इस शहर में बस तेरा जिस्म देख के,
जिसपे रेशम का दुप्पटा फिसलता बहुत है.
लूटा दी अपनी सारी खुशियाँ,
परदेस में जिस दौलत को कमाने में.
उसे कमाने के बाद हम ये समझे,
की माँ के हाथों में दौलत बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ का इरादा है,
की मुझको सवारें।
माँ का इरादा है,
की मुझको खिलाये।
माँ की आँखों की,
बस ज्योति मैं ही हूँ.
माँ ने अपनी आँखों का टीका,
बस मुझको ही लगाया है.
फिर कैसे तेरे योवन पे,
अपनी माँ को भुला दूँ.
माँ ने,
मेरे लिए चुल्ल्हा जलाया है,
माँ ने मेरे लिए,
रात के तीन बजे पुआ पकाया है.
अपनी हाथों को जलाकर,
मुस्कराकर, माँ ने मुझे,
भर पेट खिलाया है।
फिर कैसे तेरे अंगों पे,
माँ के छाले भुला दूँ.
ए हुस्न,
मेरी हसरत नहीं,
तुझको पाने की.
वो नासमझ थे,
जिन्होंने तेरी मोहब्बत में,
आसूं बहाएं।
मैं उन सितारों में नहीं,
जो अंधेरों में छोड़कर माँ को,
बस तेरा आँचल सजाए।
परमीत सिंह धुरंधर

पहाड़ों पे चढ़ के देखा,
सितारों में बढ़ के देखा,
दिखती है बस माँ, हर मंदिर में,
जब भी सजदा कर के देखा।
भूखे पेट चल के देखा,
बैलों संग खेत में बह के देखा,
चूल्हे पे बैठी दिखी माँ,
जब – जब सुनी थाली देखा।
जख्मों को दुखते देखा,
हर रिश्ते को टूटते देखा,
रात भर सिराहने बैठी मिली माँ,
जब भी तन, टॉप में तपते देखा।
कैसे तोड़ दूँ ये रिस्ता,
जवानी की मस्ती में,
जिसके आँचल में पल कर,
मैंने हर सपना देखा।
सारी दुनिया घूम के देखा,
लाखों में है एक मेरी माँ.
परमीत सिंह धुरंधर
There is nothing which has more value than mom…..
धीरे – धीरे कहता हूँ मैं अपने आँखों के समंदर से,
अगर बहना ही है तो मेरी माँ के चरणों को धो दे.
परमीत सिंह धुरंधर
औरत कितना भी शोर मचा ले,
कोई नहीं सुनता.
लेकिन, जब माँ को गुस्सा आता है तो,
कैसा भी बाप हो वो शांत हो जाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
अकेला ही खड़ा हूँ,
एक दिन तो गिरना है.
पर अपनी भी चेष्टा हैं,
सबको झुठलाने की.
बादलों ने मुख मोड़ा है,
हवाओं ने रुख बदला है.
सब विरुद्ध में हैं खड़े,
पर माँ संग में है लेके,
दुवाओं की झोली।
प्रयास हैं लहरों का,
हमको उखारने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
अपने हर निशाँ को बचाने की.
प्रयास है जमाने का,
हमको मिटाने की.
मेरा संघर्ष भी जारी है,
हर गम में मुस्कराने की.
परमीत सिंह धुरंधर