पालनहार


माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


पर्वतो के पास हैं हज़ारों नदियाँ,
वृक्षों के पास है लाखो शाखाएं।
मेरी माँ का एक मैं ही हूँ सहारा,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।
रात के पास है चाँद-तारे,
दिन को मिला सूरज की निगाहें।
माँ की उम्मीद सिर्फ मैं हूँ,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ ने पुकार है आज पुत्र कह के तुझे,
और क्या फिर ख़िताब चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।
जिसके चरणों में गंगा – यमुना,
और हाथों में हर एक धाम है.
अपने हाथों से आज खिलाया है तुझे,
और क्या फिर मान चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कीमत


शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.
वैसी सब्जियां क्या पकाएंगी, मेरी माँ जो पकाती है,
हम थे, आँखों में देख हाथ की तारीफ कर गए.
थकी-हारी, भूखी, जो सिर्फ मुझे देख के,
मुस्करा दे, वो है मेरी माँ, जिसे मैं कुछ दे न सका.
और महबूब की एक सालाना मुस्कान के पीछे,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
अब उठती है, तो माँ से बात करती है घंटो,
एक हम है जो उनके लिए कब का अपनी माँ भुला गए.
शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर 

परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


माँ है,
माँ है,
माँ है, दोस्तों,
धर्म से, ज्ञान से,
वेद से, पुराण से,
सबसे महान दोस्तों।
विधि से, विधान से,
मानव के कल्याण से,
माँ,
सबसे महान दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


एक छोटी सी झोपडी में,
चूल्हे को जलाकर,
माँ ने सेंकी है रोटी,
अपने हाथों को जलाकर.
तीन दिनों से भूखी माँ,
पानी की बूंदो पे,
मुस्काती, खिलाती,
लाल को अपने,
अपना पेट जला कर.
मैली-कुचली साड़ी में,
पैबंद को लगाकर,
खुश है मेले में माँ,
बच्चे को खिलौने दिलाकर.
एक छोटी सी झोपडी में,
गिल्ली मिटटी पे लेटी माँ,
जागती है रातभर, गीत गाती,
अपने बच्चों को बिस्तर पे,
मिट्ठी नींद में सुलाकर.

परमीत सिंह धुरंधर