नारी भारत की
कब तक प्रेम में खुद को बांधोगी?
कब तक सपनों की डोर किसी और के हाथ थामोगी?
वीडा उठा कर
मन को बाँध कर
दुनिया को जीत लो अगर अकेले चलोगी।
RSD
नारी भारत की
कब तक प्रेम में खुद को बांधोगी?
कब तक सपनों की डोर किसी और के हाथ थामोगी?
वीडा उठा कर
मन को बाँध कर
दुनिया को जीत लो अगर अकेले चलोगी।
RSD
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
शहर हो या गाँव हो,
खेत या खलिहान हो।
ना हो पाँवों में बेड़ियाँ,
ना जिस्म पे कोई घाव हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
आते-जाते नयनों से,
घर का श्रृंगार हो।
उसके मुस्कानों से,
हर एक त्योहार हो।
ना हो डर का साया कोई,
ना अपमान की मार हो।
उसकी इच्छा, उसका सपना,
उसका भी अधिकार हो।
बोल सके वह खुले मन से,
ऐसा संवाद हो।
पढ़े-लिखे हर पंचायत में,
उसके शब्दों का मान हो।
ना हो वो सिर्फ़ रसोई तक,
उसका भी ये संसार हो।
नेता, वैज्ञानिक, सैनिक भी,
हर रूप में वो स्वीकार हो।
दया, और ममता के आगे भी
नारी की तो एक पहचान हो।
शक्ति, प्रेम, करुणा की,
जीती-जागती जान हो।
सीता जैसी सहनशीलता,
लक्ष्मी जैसा दान हो।
दुर्गा जैसी हुंकार भरी,
उसकी भी पहचान हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
जहाँ वो जी सके खुलकर,
ऐसा आसमान हो।
RSD
गर्व की हर रात को, ओस में भिंगो के
ऊषा की किरणों में चमकता देखता हूँ।
मैं सोते-जागते, बस बिहार देखता हूँ।
प्रचंड धूप में, पसीने से लथपथ
मैं बहते अपने हल, और लहलहाते धान देखता हूँ।
मैं चलते-बैठते, बस बिहार देखता हूँ।
मैं कितना भी चाह लूँ तुझे ए मिट्टी,
तुझे पाने की प्यास कम होती नहीं।
परदेश की गलियों में जब भी थकता हूँ,
रसोईं में लिट्टी की खुशबू, खिचड़ी-अचार देखता हूँ.
मैं खाते-सूंघते, बस बिहार देखता हूँ।
अधरों पे छपरा तो नयनों में सीवान देखता हूँ।
मैं गाते-झूमते, बस बिहार देखता हूँ।
तुम भी देखो, जहाँ से तुम आए हो,
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
अपनी कलम से संपूर्ण ब्रह्मांड देखता हूँ।
जहाँ पग-पग पे कथा है पुरखों की,
मैं खेतों की हर मेड़ पे इतिहास देखता हूँ।
बचपन की गलियों में गूंजती किलकारी,
हर कोने में माँ का आँचल देखता हूँ।
मैं चलते-लिखते, बस बिहार देखता हूँ।
छठ की अरघ्य में उगते सूरज को,
मैं प्रवासी आँखों से नमन देखता हूँ।
करवों की भीड़ में जब “बोल बम” सुनता हूँ,
हर तरफ में गंगा का बहाव देखता हूँ।
मैं यादों में भी, बस बिहार देखता हूँ।
पटना की शामों में उम्मीदों की लौ,
गंगा की धार में समय को बहता देखता हूँ।
भोजपुर की तलवार, मिथिला का श्रृंगार,
हर दिशा में एक तेजस्वी चेहरा देखता हूँ।
मैं जागते-सपने, बस बिहार देखता हूँ।
तुम भी लौटो, इस धरती के रंग में,
जहाँ मिट्टी में सोना उगता है हर बार।
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
कविता नहीं, एक जीवंत संसार देखता हूँ।
मैं जीते-मरते, बस बिहार देखता हूँ।
RSD
कितने लहू बहाकर हम लाये थे आज़ादी
सत्ता बाँट रही हमको, जनता भूल रही हैं कुर्बानी।
अरे सबने खाई थी गोली, मिलकर सबने खाई थी लाठी
सत्ता फिर क्यों पूछ रही है हमसे अब हमारी जाति।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
गांधी -नेहरू तो जेल में थे हम सड़कों पे खा रहे थे लाठी
सह रहे थे घात-साजिश, मांग रहे थे हक़-रोटी।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
ना होते हाँ जयप्रकाश, तो कब की खुल जाती ये धोती
संविधान के पन्नों की फिर हो गयी होती होली।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
लड़े थे बिरसा लिए हाथों में अपने हाँ कुल्हाड़ी
फिर गांधी-नेहरू को ताज मिला, मिली हमें क्यों गुमनामी।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
राजेंद्र बाबू ने खाई थी लाठी, चंद्रशेखर ने गोली
गिरे थे लाला-लाजपत राय, तब कहाँ थी अहिंषक-टोली?
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
पहले उनको अलग बता के बाँट गए जो थाली
अब कहते हैं नहीं मिलेगी खाने को भी दो रोटी।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
हमारा कोयला सबको बांटा, पूरब-पश्चिम, उत्तर -दक्षिण
फिर क्यों बिहारी को मिलती है हर जगह हाँ गाली।
सत्ता बाँट रही है हमको, अब पूछ-पूछ के जाति।
कितने लहू बहाकर हम लाये थे आज़ादी
सत्ता बाँट रही हमको, जनता भूल रही हैं कुर्बानी।
RSD
धुप ये शहर की मेरे गावँ सी नहीं
कमर तेरी पतली मेरे यार सी नहीं।
ढूंढता हूँ जिसको वो सितारों में नहीं
चमकीली ये दुनिया मेरे बिहार सी नहीं।
जहाँ हम ही हम थे और थे बाग़ मेरे
मोहब्बत की वो जमीन यहाँ तो नहीं।
तुम कहते हो हम भुला दें वो बातें
हम कहतें हैं, वो दिल हैं कोई याद तो नहीं।
ये रंग बाजारों का, उन गुब्बारों सा नहीं
जिसे फोड़ते भी हम थे और फुलाते थे हमीं।
मीठी है तो, मुबारक तुम्हे ये दुनिया
इन सपनों में मेरा वो गावं तो नहीं।
कदम जो ये उठे थे जिस मुकाम के लिए
उस मुकाम पे मेरा वो मकान तो नहीं।
चूल्हे की चाय से काट जाती थी सर्दी
वो गैंठी सुलगाती मेरी माँ तो नहीं।
दिल चाहे वो गलियाँ जिसपे पेड़ हों
छावं में जिसके बैठते सब एक हो.
ऐसी होगी जिंदगी, मैंने सोंची तो नहीं।
ये शोर, ये धुंध मुझे रास आती नहीं।
यहाँ चेहरों के पीछे कहानियां कई
वहाँ चौखट के पीछे भाभियाँ कई.
यहाँ पब-बार में मज़ा पनघट का तो नहीं
जो चला था वहाँ से वो यहाँ मिलता भी नहीं।
वो छोड़ा जिसे इस महफ़िल के लिए
ये महफ़िल हमें जानती भी नहीं।
वो माटी वो महुआ, इस मदिरा से थी नशीली
और वो नशा आज तक उतरा भी नहीं।
RSD
खुदा तेरी चाहत का ये कैसा मिसरा है
लिखता हूँ तेरा नाम और लिख जाता छपरा है.
किस दर पे तेरे आऊं सजदा करने को
तेरे दर की कोई भी राह लूँ, वो ले जाती बस छपरा है.
RSD
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे – मोती
मेरे देश की धरती।
सींचे जिसको गंगा-जमुना, और कावेरी लहराती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पतली कमर तरकस सी, नैनों से बाण चलाती
मेरे देश की धरती।
माँ के तन पे फटी है साड़ी, फिर भी माँ मुस्काती
मेरे देश की धरती।
पूजते हैं बैल – गोरु, और गाय रोटी पहली खाती
मेरे देश की धरती।
भयभीत होकर जहाँ से लौटा सिकंदर, ऐसी बिहारी छाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ नानक-कबीर के दोहों को, दादी-नानी हैं गाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पग-पग पे प्रेम मिले, पल-पल में मिले थाती
मेरे देश की धरती।
सौ पुश्तों तक लड़े शिशोदिया, रंगने को बस माटी
मेरे देश की धरती।
जहाँ धूल में भी फूल खिले, पत्थर नारी बन जाती
मेरे देश की धरती।
सर्वश्व दान करके, बन गए भोलेनाथ त्रिलोकी
मेरे देश की धरती।
पिता के मान पे श्रीराम ने कर दी गद्दी खाली
मेरे देश की धरती।
भगीरथ के एक पुकार पे, स्वर्ग से गंगा उतरी
मेरे देश की धरती।
मिट गए हूण टकरा के स्कंदगुप्त से, किनारो पे लहरे मिटती
मेरे देश की धरती।
जहाँ हर दिल में गणपति, और नित्य होती उनकी आरती
मेरे देश की धरती।
इस मिटटी की यही बात है यारों, यहाँ मिट जाती हर दूरी
मेरे देश की धरती।
काँधे पे जहाँ हल शोभित और हाथों पे चमकती राखी
मेरे देश की धरती।
खेत-खलिहान, बँसवारी से पनघट, नैनों से नैन लड़ाती
मेरे देश की धरती।
पतली-कमर, बाली-उम्र, डगर-डगर, चढ़ती जवानी, इठलाती
मेरे देश की धरती।
कितना लिखूं,लिखता रहूं, खुशबू फिर भी नहीं मिटती?
मेरे देश की धरती।
RSD
You are from America.
I am from India.
Let’s make the bridge stronger
To connect America to India,
India to America.
You are from America.
I am from India.
Let’s play the chess
with a queen from America
And a king from India.
You are from America
I am from India.
Let’s play the tennis
With Serena from America
And Sania from India.
Rifle Singh Dhurandhar
इतिहास में सोनू सूद जी आपका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा
मेरे अपने बच्चों को पहला पाठ आपके ही नाम का पढ़ाया जाएगा।
परमीत सिंह धुरंधर
मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
जहाँ धूल में फूल खिलते हैं बस पाके दो बूंदें पानी की.
मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
एक बूढ़े ने बदल दी थी सनकी सियासत दिल्ली की.
परमीत सिंह धुरंधर