लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बच्चों को सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है


ऐसा नहीं है की,
मेनका एक अपवाद है.
आज भी,
भारतीय नारी को बच्चे से ज्यादा,
विश्व – सुंदरी का ख़िताब,
और अच्छे फिगर की चाहत है.
और उनके बच्चों को,
सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है.

कौन कहता है की?
भारत की धरती पे,
नारियाँ अपने बच्चों को,
मोहब्बत, ममता और मातृत्व से पोषित करती हैं.
बच्चे बिलखते हैं,
और नारियाँ अपने जिस्म में दूध को संचित करती हैं.

कैसे कोई नारी सिखलाएगी?
अपनी संतान को नारी का सम्म्मान करना।
जब नारी को खुद रिश्तों से ज्यादा जिस्म,
और दौलत की चाहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Had Adi Shankara an idea of modern Pakistan and Bangladesh?


In his life, Adi Shankara travelled within Indian subcontinent to teach the philosophy of Advaita Vedanta. He even went to Benaras and then Mithilanchal (Bihar) to defeat Mandal Mishra. Adi Shankara established four mathas at Davarka, Jagnaath Puri in Orissa, Sringeri in Karnatka and in Badrinaath in Utrakhand. Even if there is debate whether he established these mathas or inherited from others, there are no sources claiming he tired to establish or inherit any such mathas in the area of modern Pakistan, Bangladesh, and any other part of old India. During his time (8th century CE), Arab had reached and established in Sindh, but still these regions were ruled by Rajput (the Soomra dynasty 1024-1351) for along time. Even Mahmud of Ghazni defeated the Kabul Sahi dynasty in 1011 CE. Therefore, it is surprising that why Adi Shankara did not travel to the modern Pakistan or Bangladesh to establish such Mathas even if there are 5 Shakti Pithas in Bangladesh, 3 in Nepal, one in Pakistand, one in Tibbet and one in Srilanka.
So, it suggests that Adi Shankara had an idea of the division of India into modern India, Pakistan and Bangladesh.

 

Parmit Singh Dhurandhar

15 ऑगस्त


मैं 15 ऑगस्त को याद करता हूँ,
बाबा नागार्जुन को और गाता हूँ “आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,”
क्यों की और कोई गान मुझे आजादी और गुलामी का भेद नहीं बताता।
महाराणा प्रताप को,
क्यों की मैं अकबर को महान नहीं मानता।
सिरोजदौला, टीपू सुलतान और असफाक को,
क्यों की मैं धर्मनिरपेक्षता को नहीं मानता।
हिमायूं को,
क्यों की मैं उसे मुग़ल नहीं मानता।
राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल को,
क्यों की उनसे बड़ा बुद्धिजीवी कोई मुझे नहीं दिखता।
अजबदेह, पद्मावती, जीजाबाई को,
क्यों की मैं स्त्री को सम्मान देना नहीं जानता।
लाल बहादुर और इंदिरा गांधी को,
क्यों की मैं उनसे बड़ा नेता किसी को नहीं मानता।
राम मनोहर लोहिया को,
क्यों की जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति को सम्पूर्ण नहीं मानता।
और अंत में श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और उनकी रोती हुई माँ को,
क्यों की भारत वर्ष में केवल एक नाथूराम हुआ है और केवल एक महात्मा की ह्त्या हुई है, मैं इसे नहीं मानता।

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार और उत्तर प्रदेश


हम वो हैं जिसको चुना है देवों ने,
हम तो वो हैं जिसको सहा है देवों ने.
जब ग्रसित हुईं अभिमान से इंदिरा,
तो एक बृद्ध चला था जगाने गावं -गांव को.
हंस रहा था जब पूरा उत्तर प्रदेश उस पर,
तब सहारा दिया था बिहार के नौजवानों ने.
ज्ञान में हमने दिया मिथिलांचल,
शान उसकी क्या सहेगा कोई पूर्वांचल?
शंकराचार्य को परास्त किया था इसी आँगन में,
गांधी को भी दिया था हमने अभिमान इसी चम्पारण में.
जब उतरने को थी धरती पे गंगा,
बोली, इसी बिहार से जाउंगी।
जानकी भी बोली राम से, तभी बनूँगी आपकी,
जब डोली मिथिला से जायेगी।
दिनकर की आवाज यही से, नागार्जुन का तेवर यही से,
राजेंद्र प्रसाद से चंद्रशेखर,
हर बगावत की शुरुआत यही से.
बुद्ध, महावीर, गुरु गोबिंद यही के,
फिर किस पे इतना दम्भ तुम्हे?
चन्द्रगुप्त, आज़ाद शत्रु, अशोक यही के,
इतहास से वर्तमान तक कोई नहीं है हमसे आगे.
बिहार को तुच्छ समझने वालों,
तुच्छता का प्रमाण यही ही,
की हर वार पड़ी है धर्म की नीवं यही पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहादतों को सरहदों में मत बांटों


शहादतों को सरहदों में मत बांटों,
भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद,
भारत की आज़ादी के लिए लड़े थे,
ना की हिन्दू कौम के लिए.
सुभाषचंद्र बोस की लड़ाई ब्रिटिशों से थी,
ना की मुस्लिमों से.
फिरकापरस्त है वो लोग जो, धर्म और क्षेत्र में,
बाँट रहे हैं देशभक्तो को.
अस्फाकुल्लाह खान हों या टीपू सुलतान,
सब भारत की शान हैं.
उनकी शहादत भारत के लिए थी,
ना की मजहब और अपने कौम के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सरदार और गाँधी


सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
हाल वही होता जो हो रहा है तिब्बत का,
बिना इनके बलिदानो के हम आज़ाद होते नहीं।
वो हैं की,
हमारी आज़ादी को अपनी भेंट और हक़ बताते हैं.
ये हैं की अपना सबकुछ लुटा कर भी,
आज तक कुछ भी जताते नहीं, मुह खोला नहीं।
बंटवारा जिन्होंने स्वीकार किया सरहदों का,
अगर वो इतने धर्मनिरपेक्ष थे,
तो इनका ख़याल आया क्यों नहीं?
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्री


सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमें JNU नहीं, नालंदा चाहिए


हमें JNU नहीं,
नालंदा चाहिए।
तुम मांगते हो,
फ्रीडम ऑफ़ स्पीच,
हमें लोहिया चाहिए।
तुम चाहते हो दीवारें,
की साजिशें रचो.
हमें खुले आसमा के,
तले छत चाहिए।
तुम्हारे इरादें की हर फूल का,
अलग बगीचा हो.
हमें तो अनेक फूलों की,
एक ही माला चाहिए।
की अब वक्त आ गया है,
हमें चाणक्य चाहिए।
की हमें अफजल नहीं,
बस अशफाक चाहिए,
हर Crassa को अब यहाँ,
एक आफताब चाहिए।
अपनी आखिरी साँसों तक,
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई,
सबको पूरा और एक हिन्दुस्तान चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

I will return my degree if antinational activists are not punished


The purpose of any university is to educate people how to make a better society, how to spread love and how to protect their country. Otherwise what is the important of reading history of Nalanda and Takshila. I always feel proud to mention that I am from JNU. However, after seeing so many videos, I am hurt and feeling down. How can one support someone who wants to break our motherland just in the name of freedom of speech? Is this really a freedom of speech? Do we need that? Do we want to divide the country on the name of such freedom? At the same time, we worship Gandhi and other freedom fighters who fought for independence of our country. Why do we still call Sardar Patel as Lauh Purursh, if we want to break our country? I really don’t want such freedom of speech and I will never support anything against my country.

If people still think that being different is the characteristic of JNU, I am sorry, but this time line has been crossed. If government and JNU administration are unable to punish the real culprits, I will return my all degrees from JNU. I would request government to kindly provide my degrees from other university. Moreover, at the time of admission, JNU authority should ask applicants to fill in the application form whether they are comfortable with anti-India activities in JNU or not. I am sorry but as a poet I always love my motherland and I am not comfortable. I am not forcing others but it is my right or freedom that I should get degree from university that is involved in building nation and not the speaker for freedom.

 

Parmit Singh Dhurandhar