सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

भारत बेचैन है


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गंगा की मौज वोही,

हिमालय का ताज वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
दिल्ली का ताज वोही,
आदमी का राज वोही,
जनता का भ्रम वोही,
नेता का सरम वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
आसमा का चाँद वोही,
धरती का ताप वोही,
नेता का त्याग वोही,
जनता का इमां वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
क्या इस लिए की,
लोहिया की वो परखी नज़र नहीं,
चन्द्रसेखर के कुटिल वो बाण नहीं,
बाजपेयी के तीखे ब्यंग नहीं,
या जेपी का वो योवन नहीं.
क्या इसलिए, की आज
विपक्ष धरासायी है,
सत्ता की वाहवाही है,
कहीं बाबा रामदेव तो कही अन्ना ,
घिचते ये गाड़ी है.
जी नहीं,
आज भारत बेचैन ही की,
ईमानदारी के तराजू पे,
तोलकर एक एसा नेता चुना गया,
जो कमजोर नहीं, एक चोर है,
मजबूर नहीं, बेशर्म है,
जो बोलता है, पर करता नहीं,
सुनाता है अपनी, पर आम कि सुनता नहीं,
जो करता नहीं, सिर्फ बैठता है,
सत्ता कि कुर्सी पे.
भारत बेचैन है, क्यों की,
इतिहास गवाह है, की
राजा जब-जब कमजोर हुए है,
आराजकता फैली है,
लेकिन,
जब-जब दोगले हुए है,
तो भारत में पराधीनता फैली है, परमित.