माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर 

भारत


विश्व भारती,
ये है धरती,
राम-रहीम जहाँ,
एक साथ खेले.
लहराने को तिरंगा,
वीर यहाँ,
हँसते-हँसते,
झूल गए.
देखो इस हिमालय को,
हमने जिसका मान रखा,
अपने लहू से रंग दिया,
जब-जब इसका शान घटा.
विश्व भारती,
ये है धरती,
जहाँ बड़े- बड़े संग्राम हुए.
और यहीं पे,
बुध-महावीर ने,
शान्ति के पाठ पढ़ें.

परमीत सिंह धुरंधर 

एक आशिक़ की इल्तिजा जमाने से: अभी तक अपनी महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ…….


वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ


एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
तेरी आबरू, तेरी आरजू सब सवारूँगा.
हंस के रौंद गए हैं जो हमें,
उनके हर निसान को मिटा के जाऊंगा.
रख न सका जो इस जुबान को,
तो तेरी चरणों में सर कटा के जाऊंगा.
फिर से लहलहाएगी हरियाली,
फिर से तेरा दमान खुशहाल होगा,
ऐसे सजाऊंगा तेरा आँचल,
तेरे सर पे सोने का ताज होगा.
एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
हर तरफ तेरा जय – जैकार होगा.

अनुपम तेरा बलिदान


वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान
तुझसे ही मेरा घर, तुझसे ही मेरा संसार.
तुमने लुटा दी मेरे लिए अपनी हरी-भरी जवानी
तुमने त्याग दिया मेरे लिए अपना सारा श्रृंगार।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

तेरी गोद में सोया, तेरे संग सारी-रात काटी
स्वार्थी मन मेरा, फिर भी तुझपे खुरपी चला दी.
फिर भी जब-जब लौटा, तूने भर दिया मेरा खलिहान।
तुझसे ही जल रहा हैं मेरा चूल्हा दिन रात.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

तेरे लिए ही उतरी गंगा धरती पे
तेरे लिए ही नंदी, लेके हैं हल कांधों पे
तेरे लिए शिव-शंकर ने किया विष-पान.
वो कटे चने के खेत, तू है मेरे भारत की शान.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत,अनुपम तेरा बलिदान।

तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है धुरंधर इंसान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

Bhojpuri poet Dhurandhar Singh wrote this. I just compiled.

होली


सरहद पे हैं शातिर खड़े,
हम कब तक तुम्हे प्यार करें,
लूट जाएंगी ये सल्तनत मेरी,
अगर हम,
यूँ ही तेरी बाहों में रहे.
धीर बन के कर इंतज़ार मेरा,
फिर रंगूगा तुझे नए रंग से,
वैसे कमी नहीं संसार को मेरी,
तू चाहे तो, परमीत
खेल ले होली किसी और के संग में.

लुटेरा बन जा दिल


आवारा बन जा दिल,
नकारा बन जा दिल,
हर इल्जाम ले ले तू,
हंस-हंस के सीने पे.
पर अपने माँ का,
दुलारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल.
टूट रहे हैं ख्वाब,
हर एक पल में,
टूट जाने दे उन्हें.
छूट रहे है साथ,
हर एक का जीवन में,
छूट जाने दे उन्हें.
लुटेरा बन जा दिल,
बंजारा बन जा दिल,
हर पाप तू कर ले,
इन हाथों से अपने.
पर अपने माँ का,
सहारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल, परमीत.

भारत बेचैन है


Image

गंगा की मौज वोही,

हिमालय का ताज वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
दिल्ली का ताज वोही,
आदमी का राज वोही,
जनता का भ्रम वोही,
नेता का सरम वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
आसमा का चाँद वोही,
धरती का ताप वोही,
नेता का त्याग वोही,
जनता का इमां वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
क्या इस लिए की,
लोहिया की वो परखी नज़र नहीं,
चन्द्रसेखर के कुटिल वो बाण नहीं,
बाजपेयी के तीखे ब्यंग नहीं,
या जेपी का वो योवन नहीं.
क्या इसलिए, की आज
विपक्ष धरासायी है,
सत्ता की वाहवाही है,
कहीं बाबा रामदेव तो कही अन्ना ,
घिचते ये गाड़ी है.
जी नहीं,
आज भारत बेचैन ही की,
ईमानदारी के तराजू पे,
तोलकर एक एसा नेता चुना गया,
जो कमजोर नहीं, एक चोर है,
मजबूर नहीं, बेशर्म है,
जो बोलता है, पर करता नहीं,
सुनाता है अपनी, पर आम कि सुनता नहीं,
जो करता नहीं, सिर्फ बैठता है,
सत्ता कि कुर्सी पे.
भारत बेचैन है, क्यों की,
इतिहास गवाह है, की
राजा जब-जब कमजोर हुए है,
आराजकता फैली है,
लेकिन,
जब-जब दोगले हुए है,
तो भारत में पराधीनता फैली है, परमित.

रणभूमि


वक्त बदलते देर नहीं हैं,
रक्त के बहते देर नहीं हैं,
वीरों कि धरती है ये,
यहाँ आग सुलगते देर नहीं हैं,
पल में तलवारे निकल पड़ती हैं,
पल में कटारें बीछ जाती हैं,
गंगा कि लहरो पे बसी है ये धरती,
यहाँ शादी के मंडप में,
रणभूमि के सजते देर नहीं, परमीत