वीणा में तार जैसे


मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,
पास जाऊं कैसे।

 

धुरंधर सिंह

 

These lines were written by my father Dhurandhar Singh.

तेरी चोली के बटन पे मरने लगे हैं


अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.

हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.

ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.

इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं

 

परमीत सिंह धुरंधर

मिल जाए तो छोडो मत


शराब पुरानी हो अगर,
नशा होता है गजब का.
राहें काँटों से सजी हो,
सबक कुछ तो होता है, नया सा.

क्या हुआ अगर हुस्न बेवफा ही सही?
मोहब्बत तो दे गयी वो, तुझे एक रात का.
शादी हो गयी हो,
दुल्हन हो या बहू उतर गयी हो.
मिल जाए तो छोडो मत,
हुस्न हुआ ही कब है किसी का.

मुझे मिल जाए किसी मोड़ पे तो,
थाम लूँ.
चमक उठे मेरे लबों पे,
लाली उसके लबों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये ताज मेरा क्यों नहीं है?


मुझे दर्द भी है,
मुझे इश्क़ भी है,
खुदा तू बता दे,
मुझे नशा क्यों नहीं है?

आँखों में ख्वाब भी,
आँखों में अश्क भी,
खुदा तू बता दे,
नींद क्यों नहीं है?

ये काँटे भी मेरे,
ये कलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये बाग़ मेरा क्यों नहीं है?

ये राहें भी मेरी,
ये मंजिल भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये सेहरा मेरा क्यों नहीं है ?

ये सल्तनत भी मेरी,
ये तख़्त भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये ताज मेरा क्यों नहीं है?

ये लोग भी मेरे,
ये गलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये महफ़िल मेरी क्यों नहीं है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं


मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं,
काटने से पहले चुम लेते हैं.
देखने में बड़े मासूम हैं,
और आँखों से मजबूर लगते हैं.
मगर गोद में आते ही सीधा,
वक्षों पे निशाना साध देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भविष्य को बिगाड़ देती हैं


मुफ्त की रोटियाँ और हुस्न की मीठी बोलियाँ,
दोनों भविष्य को बिगाड़ देती हैं.
कौन हुआ है अमीर इस दौलत को पाकर?
ये तो आने वाली नस्लों तक को बिगाड़ जाती है.

शोहरतों के किस्से कई हैं संसार में,
मगर ये शोहरतें माँ- बाप से रिस्ता बिगाड़ देती हैं.
जिन्हे गुमान है हुस्न की वफ़ा पे, वो नहीं जानते की,
नागिन बिना दर्द के केंचुल उताड़ देती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में


हमें शौक मोहब्बत का, बर्बाद कर गया है,
उम्मीदे-वफ़ा उनसे, सब कुछ राख कर गया है.
जो खेलती हैं सैकड़ों जिस्म से यहाँ,
जाने कौन पंडित उसे शक्ति और संस्कृति लिख गया है?

जिसने उजाड़ा है यहाँ कई माँ का आँचल,
और पिता से उनके पुत्र को छीना है.
जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में,
जाने कौन पंडित उसे शुभ और गृह – लक्ष्मी लिख गया है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट ह्रदय में करवाती


अगर मोहब्बत में लड़कियाँ,
जिस्म को नहीं ह्रदय को देखतीं।
तो सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट वक्षों में नहीं,
ह्रदय में करवाती।

अगर लड़कियों की मोहब्बत में,
मीरा – राधा सा प्रेम होता, और वासना न होती,
तो वो प्रेम में उम्र और जवानी ना देखतीं।

अगर लड़कियाँ इश्क़ में,
आशिकों का जेब ना टटोलती।
तो सैनिकों को राखी नहीं, प्रेम – पत्र भेजतीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया


मेरी वफ़ा का सिला उसने कुछ ऐसे दिया,
मेरे बागों के फूल से गजरा गुंथा,
और किसी के सेज पे उसे तोड़ दिया।
आँखों की शर्म – हया थी बस मेरे लिए,
जुल्फों की छाँव किसी और को ओढ़ा दिया।
रूठ – रूठ कर मांगती थीं पायल – कंगन मुझसे,
और नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़कियाँ काबिल ही नहीं होती हैं


लड़कियाँ काबिल ही नहीं होती हैं,
वो श्रेष्ठ होती हैं, सर्वश्रेष्ठ होतीं हैं.
मगर इश्क़-मोहब्बत और वफ़ा में बस,
वो नेक नहीं, शरीफ नहीं, बल्कि फेक होती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर