विखंडित अक्स


उदास मन,
निराश हो जाता है,
कितनी जल्दी।
मैं भूल नहीं पाता,
उन काँटों को,
जिन्होंने मुझे रुलाया चुभकर.

जवानी की दहलीज़ पे,
तूने एहसास कराया खूबसूरती का.
मगर फिर तूने,
ऐसे तोडा भी इस दिल को,
आज तक उम्मीदों का दामन,
मैंने फिर पकड़ा नहीं।

दिल टूट जाने के बाद,
दिए कितने भी जला लो दिवाली के,
रौशनी नहीं मिलती।
सफलता के हर मोड़ पे,
एक दर्द आ ही जाता है.
वो असफलता और उसका दंश,
किसी सफलता से नहीं मिटती।

मैं कहीं भी छुप लूँ,
किसी के आगोस में.
वो नशा, वो सुकून,
अब कहाँ।
सच कहाँ है किसी ने,
दर्पण के टूटने से अपना ही,
अक्स विखंडित हो जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पहले विष तो पी लूँ शिव सा


शीशम के दस गाछ लगा दूँ,
दो बैल बाँध दूँ नाद पे.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
रधुकुल में भगीरत हुए,
गंगा को धरती पे लाने को.
जैसे भीष्म हुए बस,
गंगापुत्र  कहलाने को.
मैं भी धरा पे एक धारा बहा दूँ,
जो सींचते रहे मेरी गुलशन को.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
मेरा लक्ष्य नहीं जो,
साधित हो आसानी से.
वो भी नहीं जिसके पथ के,
असंख्य गामी हो.
पुत्र ही हूँ धुरंधर का,
हर क्षण -क्षण में एक कुरुक्षेत्र है.
पहले विष तो पी लूँ शिव सा,
जग को जीवन -अमृत दे के.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मानव का मूल्य


समुद्र की उठती लहरे,
भी क्रंदन से कम्पित हैं,
दूसरों का लक्ष्य मिटाती ये,
खुद अपने लक्ष्य से भ्रमित हैं.

भयंकर गर्जना करती,
हृदय में सबके,
भय को प्रवाहित करती ये,
स्वयम ही भय से ग्रसित हैं.

यह बिडम्बना हैं,
या समय का प्रवाह,
अथाह, अपार,
सम्पदा से सुशोभित ये,
मूर्खों की संगती में उत्तेजित हैं.

अहंकार है यह,
या चक्छुवों का,
सूर्य -प्रकाश में निर्बल होना,
या भाग्य ही हैं,
इन विशाल- बलवान लहरों का,
चाहे राम के बाण हो, या कृष्णा के पग
हर जनम में मानव से, ये पराजित है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेना की नौकरी


मैं तुम्हारे लिए,
आसमाँ के आंसू लाया हूँ,
और,
सरहद पर के कुछ गोलियाँ लाया हूँ.
सीने पे मेरे जो जख्म हैं,
उन्हें अब तक रख के जिन्दा,
लाया हूँ.
मैंने राते काटी हैं,
बस पानी पी – पी के.
और भूख को जिस्म में,
छुपा के लाया हूँ.
दाल में मिले कंकड़ों को सहेजा है,
आज तक तुम्हारे लिए.
और खेत हुए दुश्मनों की,
लंबी सूचि लाया हूँ.
सरकार के दिए वेतन,
में से कुछ नहीं बचा पाया तुम्हारे लिए.
दुःख है, मगर इसके सिवा,
मैं तुम्हारे लिए, सेना की नौकरी से,
सब कुछ लाया हूँ.

This is written for Indian army man from BSF who recently claimed that his officers are not giving him good food. Its painful for me to see the bad treatment our army mans are facing.

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे धूप


रातों को ढल जाने दो,
सुबह को सीने में पल जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरे तन पे ये धूप गिर जाने दो.
तुम मेरी कमर जब पकड़ते हो,
मैं कैसे फिर सोऊँ?
तुम्हारी उँगलियों के रहते मेरी जुल्फों में,
मैं कैसे अपनी आँखों में नींद लाऊं?
तुम ये रातों का दीप, पूरा जल जाने दो,
ये चाँद -तारे, उषा के आँचल में छुप जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरी वक्षों पे भी थोड़ी ये धूप गिर जाने दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Lets be together


I just want to laugh,
So, lets be together.
I just want to walk,
So, lets be together.
I don’t care,
Whether it is snow or dark night.
I don’t have any dream,
But I want to create my own niche.
So lets be together.
I don’t know what the life is?
But want to have you in my life.
So, lets be together.
I don’t care,
Whether it is shallow or deep.
So, lets be together.
I just want to laugh,
So, lets be together.
I just want to walk,
So, lets be together.

 

Parmit Singh Dhurandhar

अपनी नजरों का एक सहारा तो दे दे


महबूब मेरे,
मुझे कुछ तो चैन दे दे.
बैचैन सी हैं जिंदगी,
इसे कभी तो आराम दे दे.
तन्हाइयों में जो हैं,
ये सब कुछ बिखरा हुआ.
इन्हें कभी तो समेट कर,
अपनी संदूक में कहीं छुपा ले.
जिंदगी की उलझने मेरी,
मुझसे सुलझती ही नहीं।
तू कभी दूर से ही सही मगर,
अपनी नजरों का एक सहारा तो दे दे.
प्यासा सावन क्या बरसे किसी पे?
तू उसे अपनी जुल्फों की कुछ बुँदे दे दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम


प्रेम वही जिसमे मिलान हो,
विछोह तो गाय से बछड़े का होता है.
अभी मुख से स्तन छूट भी नहीं,
और खूंटे से इनको बंधन होता है.
प्रेम, वही, जिसमे ओठों से रसपान हो,
विछोह में तो मीरा को विषपान होता है.
अभी विरह में ह्रदय जी भर के रोया भी नहीं,
और मीरा को जग से जाना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


समुन्द्रों को बचा के रखो अपने,
इश्क़ में सबको रोना होता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर