माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही


अपनी गलियाँ ही पराई लग रहीं,
बाबुल की लाड़ली खोई – खोई लग रही.
जाने कैसा जादू कर गया, एक परदेशी?
सखी – सहेली, सब खटाई लग रहीं।

हल्दी के चढ़ने का ऐसा असर,
माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही.
सब सहने को अब है तैयार गोरी,
मायके से अच्छी, ससुराल की मिठाई लग रही.

छोटे से जीवन में क्या – क्या करें?
जीवन अब ये तन्हाई लग रही.
कैसे लड़ें, कैसे जीतें?
जब हारी हुई ये लड़ाई लग रही.

आशिक तो कब का मारा गया,
अब तो बेबस – लाचार उसकी दुहाई लग रही.
ऐसा होता है हुस्न और उसका त्रिया-चरित्र,
की सबको बस वही अबला और सताई लग रही.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा परुषार्थ असमर्थ है


देह की कामना,
देह को नहीं, मन को है.
देह की कामना,
देह से नहीं,
उसकी नग्नता, अर्ध-नग्नता से नहीं,
बल्कि उसपे चढ़े बस्त्रों से हैं.

देह की कामना,
सिर्फ शरीर, मांस, की नहीं,
उसकी अंगराई, हया, शर्म,
और उसकी साँसों के स्पंदन से है.
देह की कामना,
सिर्फ मुझपे जवानी आने,
और मेरी मर्दानगी के आभास से नहीं,
उसके नयनों की चंचलता,
अधरों की कपकपाहट,
कमर की लचक से है.

देह की कामना,
सिर्फ दृष्टि से परिभाषित नहीं,
देह की कामना,
स्वयं नारी के वक्षों, नितम्बों,
और उसके मादक लावायण्य,
विशाल, विकसित यौवन से,
संचालित है.

अतः मैं मिलना चाहता हूँ,
जानना चाहता हूँ, उन लोगो से,
जो ऐसे कामना को,
निरीह बच्चियों,
अर्ध-नग्न, नग्न स्त्रियों में देख लेते हैं.
वो उनकी सुंदरता,
उनके श्रृंगार की तुलना,
कैसे और किससे करते है?

मैं देखना चाहता हूँ,
समझना चाहता हूँ,
उनके ख़्वाबों, मेरे खवाबों की नारी के अंतर को,
उसके अंगों, वक्षों, हया और लावण्या के अंतर को.

शायद, अब देह की कामना,
नारी की लालसा,
सौंदर्य, रूप, अंग, मादकता से नहीं,
बस इससे है की,
वो सिर्फ एक नारी, मादा या लड़की है.

शायद, अब देह की कामना,
उसके अधरों, उसके नयनों, उसके जुल्फों से नहीं,
बस इससे है की,
वो यौन क्रिया को पूर्ण कर सकती है.

मेरी कलम अब भी,
असमर्थ है उस नारी जिस्म की कल्पना में,
जो वक्ष-विहीन, लावण्या – हीन,
अर्ध-नग्न या नग्न बस एक जिस्म हो.
और मेरा परुषार्थ भी असमर्थ है,
इस लालसा, देह की कामना,
को मुझमे जागृत करने,
और मुझे वासना से बसीभूत करने को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं एक धतूरा हूँ


जिंदगी ने मुझे उजाड़ा है बहुत,
पर मैं एक कैक्टस हूँ,
उग ही जाता हूँ.

बादलों ने कभी भी सींचा नहीं मुझे,
पर मैं एक बाबुल हूँ,
खिल ही जाता हूँ.

मुझमे कोई गुण नहीं,
ना ही कोई खूबियाँ।
पर मैं एक धतूरा हूँ,
शिव के चरणों में चढ़ ही जाता हूँ.

दुश्मनों के बीच, हर पल,
हर पल में उनकी साजिस।
मगर मैं एक शिव – भक्त हूँ,
अंत में जीत ही जाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

हवाओं का रुख


हवाओं का रुख कुछ ऐसा है,
की राज जानने के लिए,
वो मेरा नाम पढ़ने लगे हैं.

सब जानते हैं की मैं कुछ भी नहीं छुपाता,
पर वो मेरे आने – जाने, खाने -पीने,
पे अब नजर रखने लगे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सुडोल वक्ष


वक्ष वही सुडोल हैं जो हो आपकी हथेलियों में,
रिश्ता वही प्रगाढ़ है जो हो बिना शहनाइयों के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कैसे खोल दी बटनिया राजा तहरा बथानी में?


बड़ा – बड़ा बाबूसाहेब बिछल गइलन एहि चोली पे,
कैसे खोल दी बटनिया राजा तहरा बथानी में?
एहि कमर के लचक पे बिक गइल,
कतना के मकान – जमीन पुश्तैनी रे,
कैसे उठा दी इ लहंगा राजा तहरा बथानी में?
दिन भर हाँके पीया हमार बैल पटवारी के,
रतिया में औंघा जाला ओहिजा वोकरे बथानी में.
अभियों कोरा बाटे ये जोबन हाँ हमार,
कैसे लुटा दी राजा अइसन जोगवल थाती के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?


बड़ी बेचैन करती हो,
मेरे इरादे पूछकर।
फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?
सीने से बांधकर।

चाहत तुमको भी तो है,
कोई जवाँ – दिल मिले।
फिर क्यों दुरी रखती हो,
हाय नजरों को लड़ाकर।

हर बात में तुम्हारा,
यूँ मासूम बन जाना।
फिर क्यों घड़ी – घड़ी मुस्काती हो?
यूँ आइना देख कर.

यूँ तिरछी नजर से, मुड़कर पीछे,
किसका है इन्तिज़ार तुम्हे।
फिर क्यों आने पे मेरे?
चल देती हो यूं मुख मोड़कर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हासिम फिरोजाबादी


प्रेम में कई घायल हुए,
और कई शायर नामी।
मगर वो है सबसे अलग, सबसे जुदा
वो है हासिम फिरोजाबादी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्या देखती हो चाँद को छलनी से?


एक शाम तो ऐसी मिलो,
जब तुममे वफ़ा हो.
एक धागा तो ऐसी बांधों,
जब तुम्हारा मन सच्चा हो.
क्या देखती हो चाँद को?
छलनी से.
और मांगती हो सात जन्मों,
का रिस्ता।
अरे एक जन्म तो पहले,
सही से, किसी का साथ निभा दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर