कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे to वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए : A tribute to my father


It is a rare combination that a father – son pair has same passion or interest until it comes to politics, business and film industry.
When I was in high school, one day, I told my father, “I don’t have any quality whereas my friends are so much talented, smart and handsome. I feel bad.” My father in his characteristic smile narrated two of his poems and taught me how to write poems. It was first time he explained me the meaning of love and beauty by just telling his two lines (“वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान.”) of his poem that he wrote during his school life. He had not remembered the whole poem nor he had saved any of his poems by writing. By his second poem, he taught me to write on girl. The lines from his second poem are:
मुख मोड़ कर खड़ी है, समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं, मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है, पास जाऊं कैसे।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/17/%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87/)
Later, to pay my tribute to him, I used his lines “ वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान” and made a full poem.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है परमीत इंसान।
(https://hotcrassa.wordpress.com/2014/04/11/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8/)
However, I always wanted to write something on girl by keeping his style and view and just by changing words. I used his lines “कमर पे चोटी लटके, वीणा में तार जैसे।” and wrote “वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए ” in my recently written poem which has following lines:
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के, पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण, कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में. पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे, कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे, भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए, वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे, सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो, सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके, गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
(https://hotcrassa.wordpress.com/2017/09/13/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d/)
This is my tribute to him as a father, as a friend and as a teacher, who taught me writing. At that time, I did not understand why he wanted me to develop skills in writing. However, now, I see this as a boon or best gift from him to live life during difficult phase.

 

Parmit Singh Dhurandhar

 

वीणा में तार जैसे


मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,
पास जाऊं कैसे।

 

धुरंधर सिंह

 

These lines were written by my father Dhurandhar Singh.

तेरी चोली के बटन पे मरने लगे हैं


अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.

हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.

ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.

इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं

 

परमीत सिंह धुरंधर

मिल जाए तो छोडो मत


शराब पुरानी हो अगर,
नशा होता है गजब का.
राहें काँटों से सजी हो,
सबक कुछ तो होता है, नया सा.

क्या हुआ अगर हुस्न बेवफा ही सही?
मोहब्बत तो दे गयी वो, तुझे एक रात का.
शादी हो गयी हो,
दुल्हन हो या बहू उतर गयी हो.
मिल जाए तो छोडो मत,
हुस्न हुआ ही कब है किसी का.

मुझे मिल जाए किसी मोड़ पे तो,
थाम लूँ.
चमक उठे मेरे लबों पे,
लाली उसके लबों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये ताज मेरा क्यों नहीं है?


मुझे दर्द भी है,
मुझे इश्क़ भी है,
खुदा तू बता दे,
मुझे नशा क्यों नहीं है?

आँखों में ख्वाब भी,
आँखों में अश्क भी,
खुदा तू बता दे,
नींद क्यों नहीं है?

ये काँटे भी मेरे,
ये कलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये बाग़ मेरा क्यों नहीं है?

ये राहें भी मेरी,
ये मंजिल भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये सेहरा मेरा क्यों नहीं है ?

ये सल्तनत भी मेरी,
ये तख़्त भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये ताज मेरा क्यों नहीं है?

ये लोग भी मेरे,
ये गलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये महफ़िल मेरी क्यों नहीं है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं


मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं,
काटने से पहले चुम लेते हैं.
देखने में बड़े मासूम हैं,
और आँखों से मजबूर लगते हैं.
मगर गोद में आते ही सीधा,
वक्षों पे निशाना साध देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भविष्य को बिगाड़ देती हैं


मुफ्त की रोटियाँ और हुस्न की मीठी बोलियाँ,
दोनों भविष्य को बिगाड़ देती हैं.
कौन हुआ है अमीर इस दौलत को पाकर?
ये तो आने वाली नस्लों तक को बिगाड़ जाती है.

शोहरतों के किस्से कई हैं संसार में,
मगर ये शोहरतें माँ- बाप से रिस्ता बिगाड़ देती हैं.
जिन्हे गुमान है हुस्न की वफ़ा पे, वो नहीं जानते की,
नागिन बिना दर्द के केंचुल उताड़ देती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में


हमें शौक मोहब्बत का, बर्बाद कर गया है,
उम्मीदे-वफ़ा उनसे, सब कुछ राख कर गया है.
जो खेलती हैं सैकड़ों जिस्म से यहाँ,
जाने कौन पंडित उसे शक्ति और संस्कृति लिख गया है?

जिसने उजाड़ा है यहाँ कई माँ का आँचल,
और पिता से उनके पुत्र को छीना है.
जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में,
जाने कौन पंडित उसे शुभ और गृह – लक्ष्मी लिख गया है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट ह्रदय में करवाती


अगर मोहब्बत में लड़कियाँ,
जिस्म को नहीं ह्रदय को देखतीं।
तो सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट वक्षों में नहीं,
ह्रदय में करवाती।

अगर लड़कियों की मोहब्बत में,
मीरा – राधा सा प्रेम होता, और वासना न होती,
तो वो प्रेम में उम्र और जवानी ना देखतीं।

अगर लड़कियाँ इश्क़ में,
आशिकों का जेब ना टटोलती।
तो सैनिकों को राखी नहीं, प्रेम – पत्र भेजतीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया


मेरी वफ़ा का सिला उसने कुछ ऐसे दिया,
मेरे बागों के फूल से गजरा गुंथा,
और किसी के सेज पे उसे तोड़ दिया।
आँखों की शर्म – हया थी बस मेरे लिए,
जुल्फों की छाँव किसी और को ओढ़ा दिया।
रूठ – रूठ कर मांगती थीं पायल – कंगन मुझसे,
और नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर