पिता- पुत्र का प्रेम इतना, प्राण निकल गए राम पे।
दसों दिशा को जीतने वाले, उठ न पाये पुत्र- वियोग में।
भाई-भाई का प्रेम इतना, प्रियेशी को छोड़ गए राम पे।
छोड़ के उर्मिला को दौड़े, लक्ष्मण पीछे- पीछे राम के।
भाई-भाई का विरह इतना, मुख मोड़ गए भरत माँ से।
छोड़ दिया हर सुख जीवन का, बस राम के एक खड़ाऊं पे।
बंधू-बंधू का प्रेम इतना, भूल गए केवट हर धर्म-धाम रे।
पार लगाया सरयू के, बस पखार के पाँव राम के।
पति-पत्नी का प्रेम इतना, राम दौड़े एक सवर्ण मृग पे।
मायापति ही छले गए धुरंधर सिंह, सीता के प्रेम में।
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जीत-हार
न जीत न हार, सत्य है प्यार
क्या जीते थे राम, रावण का अंत कर
क्या जीते थे राम, सीता का त्याग कर
क्या जीते थे पांडव, दुर्योधन का अंत कर
क्या जीते थे पांडव, भीष्म का अंत कर
जीत कर भी, होती है अक्सर हार,
कर दे इस, माया का त्याग
रस है इस, जीवन का त्याग
सत्य है प्यार, न जीत न हार
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