बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाई मेरी इस कदर संगनी बन गयी है,
की संगनी मेरी तन्हा हो गयी है.
दर्पण देख के वो गुंथी है अपने केशुंओं को,
हर एक केशु में मेरी खुसबू को ढूंढती।
बेबसी मेरी इस कदर गृहणी बन गयी है,
की गृहणी मेरी बेबस हो गयी है.
सजती है जिस माथे पे लाल बिंदी लगा के,
उस माथे पे अब चिंता की लकीरे उभरने लगी है.
उदासी इस कदर मेरी जिंदगी बन गयी है,
जिंदगी मेरी अब उदास हो गयी है.
परमीत सिंह धुरंधर
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
लूट अ ता खेत में आ,
दुआर पे धुंआधार भइल बा.
ना कोई आगे – पीछे जे पगहा बाँध दी,
खुल्लम -खुल्ला अब त ई साँढ़ भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
दिन – रात खा ता हरियरी-पे – हरियरी,
सुखल भूसा पे मरखा भइल बा.
जाने का देख के बाबुल बाँध देहलन,
हमर सुकुमार देहिया पे ई पहाड़ भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
टंकी सा चल जाइन, एने-ओने,
त उठा ले ता आसमा, जी के जंजाल भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
लूट अ ता खेत में आ,
दुआर पे धुंआधार भइल बा.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत जिस्म पे कई बादल बरसें हैं, कई बादल बरसेंगें,
मगर उनका सफ़ेद झूठ देखिये, कहती हैं वो वफादार हैं.
कल मिली थी बाज़ार में, उदास, टूटी, लड़खड़ाती,
ले गयी मुझसे अपनी तारीफें बटोर कर,
और अंत में कह गयीं की मेरा पति बड़ा खुद्दार है.
जब भी रातों में तन भींगता है और मन सुखा रह जाता है,
आती हैं मेरे पास, अपने मन को भिगोने,
मन के भींग जाने पे, पल्लू संभालती,
मेरी आशाओं को तोड़ती, अंत में कह जाती है,
की तू बड़ा बेकार है, की मेरा पति बड़ा खुद्दार है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सैयां की आँखे ऐसी,
जिसपे डाल दे एक बार,
तो वो खाने लगे, फिर आचार।
मेरे सैयां लगे सावन की फुहार से,
जो मिल ले एक बार,
तो वो अपनी चुनार दे उतार।
परमीत सिंह धुरंधर
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,
मैं सीमा का प्रहरी और तू आँगन की एक कलि है.
मैं अपने स्वार्थ वस बंधा हूँ तुझसे,
तू निस्वार्थ मन से मेरे संग कष्ट उठाती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है.
तुमने काटी हस कर बरसों एक ही साड़ी में,
और लाने को नयी पोशाकें मेरे लिए,
होली में, मेरी हाथों को पैसे थमाती है.
मैं नहीं दे पाया तुम्हे कभी भो कोई खुशियाँ,
मगर तू जिन्दी के इस साँझ पे भी,
मेरी हर खुसी पे मुस्काती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,
परमीत सिंह धुरंधर
Slow down, slow down,
Honey,
Slow down, slow down,
Honey,
Because I am having,
Your babies.
Slow down, slow down,
Honey,
Don’t make me,
So crazy.
Slow down, slow down,
Honey.
Don’t make it,
Just one – night journey,
I want to live the whole life,
With you happily.
Slow down, slow down,
Honey,
Because I love to have,
More and more your babies.
Parmit Singh Dhurandhar
सारी रात,
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.
टूटी एक – एक कर,
टूटी एक – एक कर चूड़ी कलाई में,
निर्मोही ने ऐसे नचाया है.
ना सोई,
ना सोई न ही करवट बदल पाई,
बस हर घड़ी हाँ -पे-हाँ कहलवाया है.
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.
परमीत सिंह धुरंधर
गले – से – गले मिलके,
तुमने संभाला है ओठों को.
वरना हम तो बहक ही चुके थे,
देख, शहर में मयखाने को.
मिलती है अनगिनित परियाँ,
रोज, मेरी रात बसाने को.
तुम ना होते तो बिक ही जाते,
आँचल उनका सजाने को.
कई साल बीते, यूँ ही,
एक ही साड़ी पहने- पहनते.
और हर मास, मुझे नया,
सूट तुम सिलवाती हो.
ये तुम ही हो जिसने बचाईं है,
दीवारें मेरे घर की.
पर दुनिया भर में कहती हो,
नाम मेरा, अहम मेरा बचाने को.
बाहों – में – बाहें डालकर,
तुमने ही बचाया है जीवन को.
वरना हम तो मिट चुके थे,
कब का, खाते – खाते राहों में ठोकरों को.
परमीत सिंह धुरंधर
बैल, सैया हमार,
बकलोल रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.
लाख मन के योवन,
चोलिये में रह गइल.
सैया बथान में,
पुआल देखे रे.
देवरानी दही पे,
रोज छाली चखे.
नन्दी घूम-घूम के,
गावं में दावँ मारे रे.
जलअता योवन हमार,
चूल्हे की आंच पे.
सैया दुआर पे,
तास खेले रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.
परमीत सिंह धुरंधर