कू-ए-यार में


किसकी मोहब्बत सजी है नसीब की राह में,
यार ज़मीन भी दे, जिस्म भी दे—तो क्या?
बेवफ़ाई ही तो रहती है कू-ए-यार में।

दिल ने तलाश की थी सुकूँ उसकी आगोस में,
घाव ही घाव मिले हमको कू-ए-यार में।

हमने भी चाहा था उम्र गुजरे उसकी बांह में,
नाम तक ना रहा अपना अब कू-ए-यार में।

रातें गुज़र गईं उसकी चाह की याद में,
ख़्वाब टूटते रहे चुपके चुपके हिसार में।

जिस्म और जाँ भी मिले हों तो क्या हुआ ऐ दिल,
वफ़ा कभी नहीं मिलती कू-ए-यार में।

हम तो खुश थे उसके झूठे इकरार में,
अब नाम भी कोई याद करता नहीं कू-ए-यार में।

RSD

Inspired by the Sher, “कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में”, this is my reply to it.

मेरी कहानी


तू आज तड़पाने में मसरूफ़ है,
कल तेरी तड़प मेरी कहानी होगी।

RSD

बिजली बना दी


अंगों-ने-अंगों से टकरा के बिजली बना दी
कम्बख्त फिर जलने से कौन बचता?
सबने कहा की परमित ना जा उसके पास
मगर राजपूत रण से पीछे कैसे हटता?

जवानी है, जवानी है, जवानी है-२
तभी तो निगाहों में कहानी है.
कोई बंद कमरे में सुलग रहा
कोई बहती दरिया का पानी है.

वक्त के भीड़ में तुम्ही बगल गए
हम तब भी, अब भी अकेले हैं.

तेरी आँखे ऐसी, की तनहा शराब हो गयी
तेरे जिस्म पे रेंग के हवा मेरे गावं की
जो मीठी थी, अब आग हो गयी
तू क्या खुद को संभाल रही है और किसके लिए
बिहार में चर्चा है की तू अब जवान हो गयी.

RSD


जब भी मिलोगी तुम्हे जला के रख दूंगा
बारूद बिछा के दिल में सुलगा के रख दिया है.
जिसको भी हरा नहीं पाया मैं दिन के उजालों में
उसे रात के अंधेरों में काट के रख दिया है.
दिल की दुनिया में सिर्फ तेरा ही है साया
मैंने सरहदों को इस कदर बाँध दिया है.
ग़ालिब की बस्ती में तन्हा तो कोई नहीं हैं
टूटे दिल में मैंने दर्द को यूँ रख दिया है.
इतना भी ना तोड़ो, मैं मुस्करा ना हाँ सकूँ
एक मुस्कराने के लिए ही है तुझको छोड़ दिया है।

RSD

चिंगारी


मैं लिख रहा हूँ तेरी जुल्फ पे किताब
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे रूप को शराब।
मैं लिखता हूँ तेरी आँखों को अपना अंतिम पड़ाव
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे वक्षों पे विश्राम।
मैं लिखना चाहता हूँ तुझे चाँद और मेरा आसमान
मेरी कलम लिखती हैं तुझे मेरा गावं-मेरा बिहार.

तेरे जिस्म की अंगड़ाइयां तेरी आखों की गहराइयों पे भारी हैं
तू मिल जाए तो आग लग जाए, तू राख में दबी ऐसी चिंगारी है.

तू दिन भर की धुप के बाद की एक चाँद है
तू लिट्टी-चोखा पे आम की आचार है.
तू मिल जाए तो झूम उठे हर राही
तू सतत-अभियान का आखिरी पड़ाव है.

RSD

किताबों में लिखा तेरा नाम है


ये पढ़ने वाले लोग यूँ ही नहीं परेशान है
की शहर की सभी किताबों में लिखा तेरा नाम है.
जुल्म की इंतहा क्या होगी
दिमाग से तेज लोगों का दिल तेरा गुलाम है.

RSD

मंजिले उम्र भर का पड़ाव नहीं होती


वो अब एक चाय के लिए भी नहीं पूछते
जो कल तक मेरे घर आते बहुत थे.

भीड़ में अब भी खींचता है कोई
मंजिले उम्र भर का पड़ाव नहीं होती।
तुझे इश्क़ है दिल से तो दिल लगा
यहाँ जिस्म से भी रात गुलजार नहीं होती।
तूने तोडा है इस कदर मुझे की अब
किसी और से जुड़ने की कोई बात नहीं होती।
मिलेगा लिट्टी -चीखा तो बैठ जाएंगे खाने को
वरना जिस्म को अब थकन नहीं होती।

तेरे इंतज़ार में अब बस बेबसी है
मेरी तन्हाई का दर्द ये दुरी नहीं तेरी खामोशी है.

RSD

किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है


किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है
इश्क़ में ये दिल टुटा बहुत है.
तुझे प्यास लगे तो लहू से भी मिटा देंगे
मेरी जिंदगी में प्यास बहुत है.
जिस्मानी सुखों का अंत नहीं
राहे-दिल में भी दुःख बहुत है.
मुस्कुराता नहीं हूँ, ये शिकायत है उन्हें
की इन लबों ने नमक पीया बहुत है.
जमाने की नजरों में पिछड़ा होगा बिहार
मगर उस जमीन पे खुशियां बहुत हैं.
यकीं ना हो तो घर बसा के देखो बिहारी का
वहाँ के ससुराल में सुकून बहुत है.
यूँ ही नहीं कहते हैं हमें बाबूसाहेब
छपरा-सीवान, पटना तक हमारा रोआब बहुत है.
हम अब भी ज़िंदा हैं उसे यकीन नहीं होता
इश्क़ में हमें जिसने रुलाया बहुत है.
हमें उतरा बीच हाइवे पे दोस्तों ने ही कार से
मगर बेचनेवालों को भी खुदा ने बनाया बहुत है.
हमने किसी को थमा नहीं उसके ठुकराने के बाद
उसने भी ज़माने को नचाया बहुत है.
उम्मीदों के समंदर में सब है बस वो नहीं
जिसके किनारों पे हमने घर बनाया बहुत है.
जिंदगी की तलाश में कुछ भी नहीं तरस पाएं
इस मुकाम पे भी ये मलाल बहुत है.

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बेवफा


नजर की ख्वाइशें नजर में रह गयी
जो दिल में दबी थी वो दिल में रह गयी.
हम पीते रह गए जिसकी याद में
वो सब मिटा के डोली चढ़ गयी.
कुछ भी नहीं इश्क़ में एक धोखा के सिवा
और बेवसी देखिये की बेवफा को कलम वफ़ा लिख गयी.

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मिला ना मुझको दर्द का वो हिस्सा जिंदगी


मिला ना मुझको दर्द का वो हिस्सा जिंदगी
ग़ालिब ने लिखी बैठ के जिसे सारी जिंदगी।

बहुत दिनों की अय्यासी ने बस एक खालीपन दिया
चार दीवारों के बीच तन्हाई और भीड़ में अकेलापन दिया।
वक्त रहते संभाल न सका मैं अपने पावों को
तो गुजरते वक्त ने बस एक सूनापन दिया।

खवाबों तक ही रह गयीं आपके लिए मेरी प्यास
निगाहें मिली, बरसात भी हुई, पर मिट ना सकी ये आग.
जा तुझे छोड़ रहा हूँ तेरी ही ख़ुशी के लिए
तू किसी की भी बाहों में झूले, पर ना मिलेगी मेरी बाहों की मिठास।

वो अपनी मोहब्बत के तारे गिन रहे हैं
और हम शहर में उनके सहारे जी रहें हैं.

भंवर-भाँवर में पंवर -पंवर के
चंवर – चाँवर में चहल -चहल के
देख लेहनी, मिलल ना कोई तहरा जइसन
चुम्बक लागल बा जेकरा कमर में.
नहर -नाहर में छान-छुन के
पोखर -पखार के लांघ-लूंग के
देख लेहनी, मिलल ना कोई तहरा जइसन
चुम्बक लागल बा जेकरा कमर में.

RSD