मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


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मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी


वो शाम की अंगराई, वो रातों की रजाई,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तेरी पतली कमर, जैसे मिटटी की ठंढी सुराही,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।
तू खांटी सरदारनी, मैं बांका बिहारी,
तू मिल जाए मुझको तो, तेरी माँ को मिले जमाई।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Bra और हल्दी


तेरे – मेरे आँखों का एक ही किस्सा,
भाने लगी तू मुझको बिन Bra हाँ.
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे खोलना पड़े मुझे सारी रात Bra।

तेरे – मेरे दांतों का एक ही है किस्सा,
दोनों को लग गया है खून का चस्का।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे बहाना पड़े मुझे सारी रात पसीना।

तेरे – मेरे नैनों का एक ही है किस्सा,
दोनों हैं नशीले और दोनों हैं जवाँ।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे सारी रात पड़े मुझे हल्दी छापना।

तेरे – मेरे रातों का एक ही है किस्सा,
तेरे बक्षों को डंसता बन के कोबरा।
पाने के लिए तुझे कुछ भी कर जाऊं,
चाहे सारी उम्र पड़े ये बोझ उठाना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ


तेरी काली – काली आँखों में हम काजल बनकर बह जाएँ,
तेरे गोरे – गोरे गालों पे कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ.
इस देश – सीमा के विवादों से दूर, तुझे लेके कहीं बस जाएँ,
मेरे नन्हें – मुन्नें चार, मेरा नाम लेकर, हर सुबह तुझसे लिपट जाएँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें


कुछ नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें उनकी,
कुछ दर्जी का दोष है, कुछ उनकी जवानी का.
यूँ ही नहीं निकलते हैं लोग गलियों में,
कुछ गर्मी का असर है, कुछ उनकी जवानी का.
और कब तक बांधें वो भी लज्जावस अपनी साँसों को,
कुछ मेरी बाहों का असर है, कुछ उसकी जवानी का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इस शहर से उस शहर तक


मेरे दुश्मनों की कमी नहीं है,
इस शहर से उस शहर तक.
ता उम्र बस यही,
दौलत तो कमाया है.
मैं भले ही नास्तिक हूँ खुदा,
पर सारे जमाने को आस्तिक बनाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़कियाँ शादी के बाद


वो जो कल तक इठलाती थीं,
अपनी अंगराई पे.
मुझे ठुकरा दिया,
किसी और की शहनाई पे.
शादी के बाद, जाने क्यों?
कुम्हलायी सी लगती हैं.
लड़कियाँ,
अक्सर शादी के बाद ही सही,
लेकिन अपनी आशिक की
परछाई को तरसती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे गावँ का पता


यूँ ही नहीं हैं बहारें मेरी किस्मत में,
मैंने कइयों को रौंदा हैं, टकराने पे.
तूफानों को भी पता है, मेरे गावँ का पता,
यूँ ही नहीं मुख मोड़ लेती हैं आंधियाँ मेरे दरवाजे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


सफर का नशा तेरी आँखों से है,
वरना मंजिलों की चाहत अब किसे है?
मैं चल रहा हूँ की तुम साथ हो,
वरना इन साँसों की चाहत अब किसे है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही


अपनी गलियाँ ही पराई लग रहीं,
बाबुल की लाड़ली खोई – खोई लग रही.
जाने कैसा जादू कर गया, एक परदेशी?
सखी – सहेली, सब खटाई लग रहीं।

हल्दी के चढ़ने का ऐसा असर,
माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही.
सब सहने को अब है तैयार गोरी,
मायके से अच्छी, ससुराल की मिठाई लग रही.

छोटे से जीवन में क्या – क्या करें?
जीवन अब ये तन्हाई लग रही.
कैसे लड़ें, कैसे जीतें?
जब हारी हुई ये लड़ाई लग रही.

आशिक तो कब का मारा गया,
अब तो बेबस – लाचार उसकी दुहाई लग रही.
ऐसा होता है हुस्न और उसका त्रिया-चरित्र,
की सबको बस वही अबला और सताई लग रही.

 

परमीत सिंह धुरंधर