मैं एक धतूरा हूँ


जिंदगी ने मुझे उजाड़ा है बहुत,
पर मैं एक कैक्टस हूँ,
उग ही जाता हूँ.

बादलों ने कभी भी सींचा नहीं मुझे,
पर मैं एक बाबुल हूँ,
खिल ही जाता हूँ.

मुझमे कोई गुण नहीं,
ना ही कोई खूबियाँ।
पर मैं एक धतूरा हूँ,
शिव के चरणों में चढ़ ही जाता हूँ.

दुश्मनों के बीच, हर पल,
हर पल में उनकी साजिस।
मगर मैं एक शिव – भक्त हूँ,
अंत में जीत ही जाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

हवाओं का रुख


हवाओं का रुख कुछ ऐसा है,
की राज जानने के लिए,
वो मेरा नाम पढ़ने लगे हैं.

सब जानते हैं की मैं कुछ भी नहीं छुपाता,
पर वो मेरे आने – जाने, खाने -पीने,
पे अब नजर रखने लगे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?


बड़ी बेचैन करती हो,
मेरे इरादे पूछकर।
फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?
सीने से बांधकर।

चाहत तुमको भी तो है,
कोई जवाँ – दिल मिले।
फिर क्यों दुरी रखती हो,
हाय नजरों को लड़ाकर।

हर बात में तुम्हारा,
यूँ मासूम बन जाना।
फिर क्यों घड़ी – घड़ी मुस्काती हो?
यूँ आइना देख कर.

यूँ तिरछी नजर से, मुड़कर पीछे,
किसका है इन्तिज़ार तुम्हे।
फिर क्यों आने पे मेरे?
चल देती हो यूं मुख मोड़कर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये एक दर्द रखता हूँ


इंसानियत में फ़र्ज़ रखता हूँ,
गुनाहों में सब्र रखता हूँ.
वो जो हँसते हैं मुझपे,
बस उनकी ख़ुशी के लिए,
ये एक दर्द रखता हूँ.

हुस्न को देख लिया है इतने करीब से,
की अब इश्क़ में मौन रखता हूँ.
वो चाहे जितने भी लिख लें,
सीता – सावित्री के किस्से।
मैं केवल मेनका – ये एक शब्द लिखता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रास्ता


तुम मुझसे शहर का रास्ता पूछते हो,
मैं तो खुद भटक रहा हूँ,
और तुम मुझे सफल बताते हो.
तो सुनो कह रहा हूँ,
की मेरी माँ कहीं है, और मैं कहीं हूँ,
और तुम मेरे परिवार का हाल पूछते हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते


गावं के वो बगीचे आम के,
जिसपे बंदरों के झुण्ड खेलते।
गांव के सड़कों पे अनगिनत कुत्ते,
अँधेरी रातों में दौड़ते और भोंकते।
वो बैल नाद पे, वो गाय बथान में,
वो घूर, वो अलाव तापते।
वो थोड़ी सी आग, आँगन से मांगते,
वो रहर का खेत, जिसे हम अगोरते।

वो लड़कियों का समूह में,
बलखाते, खिसियाते, हँसते, और झेंपते।
वो शादियों में लड़कियों को टापते,
वो उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते।
मेरी गालों पे हल्दी – दही का लगाना,
और हम उनपे सब्जी के छींटे उड़ाते।
वो नहर पे, बगीचे में दुपहर के,
वो चक्की पे आंटे के, घोनसार में उनसे सटते,
उनसे चिपकते।
आते – जाते राहों में, उनको हाले – दिल सुनाते।

सुना है, अब गांव भी बदल गया है,
ये सब अब एक गुजरा कल हो गया है.
अब दोपहर हो या शाम,
व्हाट्सप से लोग हैं दिलों को जोड़ते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अलार्म


जिंदगी में अकेला पड़ गया हूँ,
तन्हाई में तन्हा पड़ गया हूँ.
दोस्तों के नाम पे बस,
एक घड़ी ही रह गयी है साथ में.
जिसके अलार्म को मैं अनसुना करने लगा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दुआएं और दवाएं बेकार गयीं


अश्कों के ढेर के नीचे,
हूँ मैं दबा हुआ.
किसी ने आग लगाने की कोसिस की,
और उसकी सारी तीलियाँ बेकार गयीं।

इस कदर दिल टुटा है मेरा,
की दोस्तों की दुआएं और सारी दवाएं,
सब बेकार गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


यूँ ही नहीं उन्हें शौक है मेरे अश्कों का,
हर किसी को मेरी मौत का इंतज़ार है.
अपनी मंजिलें छोड़कर,
वो रखते हैं नजर बस मेरी राहों पे.
हर किसी को यहाँ मेरे गिरने का इंतज़ार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर