जीवन वही है,
जिसमे धाराएं हों.
पेड़ वही है,
जिसमे शाखाएं हों.
नारी वही है,
जिसमे वफ़ाएं हों.
कब तक सोओगे गहरी निंद्रा में,
पौरष वही जिसके पथ में बाधाएं हों.
परमीत सिंह धुरंधर
जीवन वही है,
जिसमे धाराएं हों.
पेड़ वही है,
जिसमे शाखाएं हों.
नारी वही है,
जिसमे वफ़ाएं हों.
कब तक सोओगे गहरी निंद्रा में,
पौरष वही जिसके पथ में बाधाएं हों.
परमीत सिंह धुरंधर
शहर का शहर है जल रहा,
हुस्न उसका, प्रबल इतना।
क्या वसुधा?
उसकी जुल्फों के लपटों से,
अम्बर तक झुलस रहा.
तारे -सितारे सब टूट रहे,
चाँद भी उनका हो गया है दुर्बल सा.
कोने -कोने में नभ के अमावस्या फ़ैल रहा,
रूप उसका, प्रखर इतना।
परमीत सिंह धुरंधर
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के,
पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण,
कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में.
पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे,
कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे,
भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो,
सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके,
गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
परमीत सिंह धुरंधर
अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.
हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.
ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.
इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे दर्द भी है,
मुझे इश्क़ भी है,
खुदा तू बता दे,
मुझे नशा क्यों नहीं है?
आँखों में ख्वाब भी,
आँखों में अश्क भी,
खुदा तू बता दे,
नींद क्यों नहीं है?
ये काँटे भी मेरे,
ये कलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये बाग़ मेरा क्यों नहीं है?
ये राहें भी मेरी,
ये मंजिल भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये सेहरा मेरा क्यों नहीं है ?
ये सल्तनत भी मेरी,
ये तख़्त भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये ताज मेरा क्यों नहीं है?
ये लोग भी मेरे,
ये गलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये महफ़िल मेरी क्यों नहीं है?
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं,
काटने से पहले चुम लेते हैं.
देखने में बड़े मासूम हैं,
और आँखों से मजबूर लगते हैं.
मगर गोद में आते ही सीधा,
वक्षों पे निशाना साध देते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
हमें शौक मोहब्बत का, बर्बाद कर गया है,
उम्मीदे-वफ़ा उनसे, सब कुछ राख कर गया है.
जो खेलती हैं सैकड़ों जिस्म से यहाँ,
जाने कौन पंडित उसे शक्ति और संस्कृति लिख गया है?
जिसने उजाड़ा है यहाँ कई माँ का आँचल,
और पिता से उनके पुत्र को छीना है.
जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में,
जाने कौन पंडित उसे शुभ और गृह – लक्ष्मी लिख गया है?
परमीत सिंह धुरंधर
अगर मोहब्बत में लड़कियाँ,
जिस्म को नहीं ह्रदय को देखतीं।
तो सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट वक्षों में नहीं,
ह्रदय में करवाती।
अगर लड़कियों की मोहब्बत में,
मीरा – राधा सा प्रेम होता, और वासना न होती,
तो वो प्रेम में उम्र और जवानी ना देखतीं।
अगर लड़कियाँ इश्क़ में,
आशिकों का जेब ना टटोलती।
तो सैनिकों को राखी नहीं, प्रेम – पत्र भेजतीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी वफ़ा का सिला उसने कुछ ऐसे दिया,
मेरे बागों के फूल से गजरा गुंथा,
और किसी के सेज पे उसे तोड़ दिया।
आँखों की शर्म – हया थी बस मेरे लिए,
जुल्फों की छाँव किसी और को ओढ़ा दिया।
रूठ – रूठ कर मांगती थीं पायल – कंगन मुझसे,
और नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया।
परमीत सिंह धुरंधर