तपिश


तपिश बढ़ी धरती की तो बादल छा गए
बरसने ही वाले थे की हवा उन्हें उड़ा गए.
यूँ ही रह गयी प्यास मेरे अधरों पे
नजरें लड़ाते-लड़ाते वो मेहँदी रचा गए.

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शाम


वो अलग लोग थे जो भेजते थे बादलो से पैगाम
ये हम हैं जो हरे पत्ते पे लिख देते हैं तेरा नाम
तू जब जुल्फों को बांधे इनके फूलों से तो ये गुनगुना दें
तेरे कानों में धीरे से कैसे गुजरती है तेरे बिना मेरी शाम.

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शर्म


तेरी शर्म तुझपे ही नहीं मुझपे भी भारी है
हो जाने दे कोई गुनाह, इस मोड़ पे वो जरुरी है.
तू कल खंजर भी उतार दे तो कोई गम ना होगा
आज किओ रात बस तेरी ही जी हुजूरी है.

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खंजर भी उतार गया


हुस्न जब भी मिला उनका एक नशा सा छा गया
बेवफा ही सही वो, मगर मजा तो दे गया.
अधरों को अधरों पे टिका कर, वो बहुत कुछ सीखा गया
वक्षों तक आते-आते, वो खंजर भी उतार गया.

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