परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

ज्ञान


ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.

परमीत सिंह धुरंधर 

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

फक्कड़


मैं पीता नहीं हूँ, पर पियक्कड़ हूँ मैं.
मैं बुद्धू ही सही, पर बुझक्कड़ हूँ मैं.
कहीं आता-जाता नहीं, पर घुमक्कड़ हूँ मैं.
मुझे क्या समझोगे, समझने वालों,
मैं फ़कीर नहीं हूँ, पर फक्कड़ हूँ मैं.
मुझे कुछ याद नहीं, कब क्या घटित हुआ,
पर आज भी उनके होठों का चक्कर हूँ मैं.

परमीत सिंह परवाज

जवानी


दिल चाँद बनके आज भी घटता – बढ़ता रहता है,
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.
इतने कांटो से जख्मो को पाकर भी,
ये बागों में जाकर फूलों को चूमता रहता है.
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.

परमीत सिंह परवाज

दिल्ली – सल्तनत


दिल्ली – सल्तनत की एक ही कहानी,
ताकत से तख़्त है, तख़्त से है रानी।
छल से जीतो चाहे बल से जीतो,
धर्म से या अधर्म से जीतो, धुरंधर सिंह
दुनिया करेगी गुणगान तुम्हारा,
और चुम्बन देगी रानी।

मानव – मन


मानव – मन, कितना चंचल,
छन से पल में, पल से छन में,
कभी इस उपवन से उस उपवन,
कभी इस वन से उस वन,
करता है भ्रमण,
मानव – मन.
न प्यास मिटे, न भूख मिटे,
न साध्य सधे, न लक्ष्य मिले,
कसता जाता है, नित-प्रतिदिन,
प्रतिदिन – नित्य एक नया,
लोभ का बंधन,
मानव – मन.
गुरु की बगिया में, प्रेमिका की यादें,
प्रियेशी की बाँहो में, गुरु की तस्वीरें,
उलझता है, मचलता है,
भटकता है, यूँ हीं, लक्ष्यहीन
सारा जीवन, धुरंधर सिंह का,
मानव – मन.

लड़कियां


रात्रि के तिमिर में,
अन्धकार के शिविर में,
जलाई जा रही हैं लडकियां।
सुबह-सुबह खबर आ रही है,
रेडियों पे, दूरदर्शन पे,
अखबार में की,
मिटाई जा रही हैं लडकियां।
३३ % का आरक्षण,
सबकी ये मांग है.
पर, आज भी,
करीना, विपाशा, प्रियंका,
और अब तो आलिया ही,
सबकी चाह हैं.
फिर भी,
घर-घर में सताई जा रही है लडकियां।
पापा के आने पे रो रोटी को,
गरम कर दे खाने को,
भाई के देखते ही जो,
पापड़ – तिलोड़ी छान दे,
ऐसी निपुण होनहार हो के भी,
मेहमान के सामने,
काम बताई जा रही है लड़कियां।
कौन है आज समाज में,
उनके हश्र का कारन, धुरंधर सिंह,
लोग कुछ भी कहते रहे,
मैं तो गिनायें जा रहा हूँ लडकियां।

बैलों और भैंस म…


बैलों और भैंस में येही अंतर है कि भैंस घांस खुद चर लेती है और बैल को काट के, खल्ली मिला के खिलाना होता है, परमीत.