रौशनी नहीं, केवल रोशनदान चाहिए,
अब मनुष्य को बस एक मकान चाहिए।
भटके हए हैं इंसान यहाँ,
इनकी इंसानियत को एक हैवान चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
रौशनी नहीं, केवल रोशनदान चाहिए,
अब मनुष्य को बस एक मकान चाहिए।
भटके हए हैं इंसान यहाँ,
इनकी इंसानियत को एक हैवान चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो जवान हुआ,
कितनों ने राहें बदली, कितनों ने सलवार बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो कुर्बान हुआ,
कितनों ने निगाहें बदली, कितनों ने आँगन बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो धनवान हुआ,
कितनों ने रातें काटी, कितनों ने दांत काटी।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो परेशान हुआ,
कितनों ने ईमान बदली, कितनों ने पहचान बदली।
परमीत सिंह धुरंधर
दिया वो ही बुझाते हैं,
जो शर्म का ढिढोंरा पीटते हैं.
जहाँ जमाना चुप हो जाता है,
हम वहाँ अपनी आवाज उठाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
धोखा देते हैं सच्चे को,
और झूठे पे, जान निसार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
कोई कहता शादी,
कागज़ का एक टुकड़ा है.
किसी को मौत तक,
इस लाल जोड़े का इंतजार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
दिल और नज़रों के इस खेल में,
बस अब जिस्मों का व्यापार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.
परमीत सिंह धुरंधर
जंग तो होगी,
चाहे पूरी दुनिया एक तरफ,
और मैं अकेला ही सही.
नूरे – धुरंधर हूँ मैं,
पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
मौत का भय मुझे क्या दिखा रहे हो,
लाखो दर्द में भी जो मुस्कराता रहा,
खून उसका हूँ मैं,
झुकने का सवाल ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं घनघोर विरोधी हूँ,
चक्रवात सा.
मेरी प्रखरता,
है आज भी एक विवाद हाँ.
ना रोक सके न तोड़ सके,
ना मोड़ सके कोई.
इसलिए कहते हैं सभी की,
मेरा होगा बुरा अंजाम हाँ.
परमीत सिंह धुरंधर
भारत को जीत कर भी,
तुम कभी जीत नहीं पाओगे।
हम राजपूतों – जाट -मराठों को,
तुम कभी बाँध नहीं पाओगे।
तुम चाहे तोप बरसा लो,
या हमपे हाथी दौड़ा लो.
रणभूमि में तुम हमें,
कभी पछाड़ नहीं पाओगे।
तानसेन के छंदों पे,
जितना भी वीर बनले अकबर।
राणा की बरछी का,
सामना नहीं कर पाओगे।
सुन लो ए मुगलों,
चाहे भाइयों को भाई से लड़ा लो.
मगर कभी अकबर को ना,
रणभूमि में उतार पाओगे।
हम हारकर भी, झुक जाए,
मिट जाए, अगर किसी दिन.
पर सिक्खों की बस्ती में,
तुम लोहा ना उठा पाओगे।
की जब तक हैं गुरु गोबिंद सिंह जी,
ए मुगलों,
तुम कभी भारत न जीत पाओगे।
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.
हर बार चाहता हूँ,
अपना ईमान बेंच दूँ.
पर एक आवाज आती है,
ये मेरा काम नहीं.
लोग कहते हैं की मैं अकड़ता बहुत हूँ,
मगर दोस्तों मैं पिघलता भी बहुत हूँ.
एक बार भी किसी ने चुम्मा है मेरा माथा,
हर बार रखा है,
फिर सर को उसके चरणों में वहीं।
आते हैं मुझे लूटने के सौ तरीके,
मगर क्या करें,
मेरे पूर्वजों की फितरत ही लुटाने की रही.
और जब तक महाराणा की साँसे हैं,
मेरे खडग को मेवाड़ में,
मुगलों का साया भी बर्दास्त नहीं.
मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत लड़कियां एक जाल बिछाती हैं,
मगरमच्छ के आंसू से बन्दर फंसाती है.
पुरुष-प्रधान समाज से इनको है शिकायत,
मगर अपने डैड को परफेक्ट मैन बताती हैं.
नारी के अधिकार पे स्वतंत्र विचार रखने वाली,
ये अपने भाई के प्रेमिका को चुड़ैल बताती हैं.
इन्हे पसंद हैं रहना खुले आसमान के तले,
घोंसलों को बनाना इनके अरमान नहीं,
मगर तीस तक पहुँचते – पहुँचते,
ये शादी – शादी और सिर्फ शादी चिल्लाती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर