राममनोहर लोहिया: मैं टकराता चलूँगा


यूँ ही जुल्म को मिटाता चलूँगा,
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम सत्ता के जिस सिहासन पे बैठो हो,
मैं उसकी जड़ों को हिलाता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हारे वादे झूठे, दिखावे और फरेब हैं,
मैं जन-जन को ये बताता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हे अगर भूख है गरीबों के लहूँ की,
तो मैं तुम्हारी बागों को उजाड़ता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हे गुरुर है जिन गुलाबों के प्रेम पे,
जब तक सांस हैं तन में,
मैं इन गुलाबों को सुखाता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।

परमीत सिंह धुरंधर

अलका लम्बा की जवानी शीला दीक्षित जी रही हैं


गलत पति चुनने से लड़की का जीवन बर्बाद हो जाता है, कैसे ?
बोलो दोस्तों। बोलो दोस्तों।
क्यों की उसकी जवानी, उसकी सौतन ले लेती है.
आज अलका लम्बा की जवानी शीला दीक्षित ने ले ली.
क्यों की उसकी नींदे उसकी सौतन सोती है.
आज से अलका लाम्बा की रातों की नींद, शीला दीक्षित जी सोयेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

The hot smoking girl


The hot smoking girl,

Black and tall.

With denim jeans,

And with a Gold Flake,

She held my hand.

We walked together,

At Rajiv Chowk .

Parmit Singh Dhurandhar

केजरीवाल की सहायता से लालू राज लाएंगे


लालू राज लाएंगे, लालू राज लाएंगे,
केजरीवाल की सहायता से, लालू राज लाएंगे।
खोखला अहंकार को स्वाभिमान बता रहें,
ये केजरीवाल जी हैं, भैंस को गाय बता रहें।
फिर मिल बैठ के संग सब चारा खाएंगे।
केजरीवाल की सहायता से, लालू राज लाएंगे।
चाहे राबड़ी जी बैठे, या सत्ता पे नितीश जी,
जनता की तिजोरी में चूना फिर लगाएंगे।
केजरीवाल की सहायता से, लालू राज लाएंगे।

परमीत सिंह धुरंधर

नारी सम्मान या एक ढोंग


रामायण, महाभारत और भारतीय घरों में कलह और बटवारे का दोष सदा से भारतीय नारियों के माथे मढ़ा गया है. लेकिन, आज तक किसी ने भी देश के बटवारे का दोषी ढूढ़ने का प्रयास नहीं किया, क्यों की इसके जिम्मेवार हमारे पुरुष भाइयों की सत्ता की भूख और उनकी सोच थी. नारी सम्मान की चिंता करने और उसके लिए चिल्लाने वालो ने कभी इस तरफ धयान नहीं दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

अजबदेह – जोधाबाई


एक जोधा के प्रेम के,
हज़ार किस्से कहने वालों.
कभी अजबदेह के त्याग की,
एक कहानी तो गढ़ के देखो.
क्षत्राणी थी, अभिमानी थी,
अपने पति की प्राण-प्यारी थी.
जोधा ने जिसका त्याग किया,
चंद सोने – चाँदी की चाहत में.
अजबदेह ने शान राखी,
पुरखों के उस निशानी की.

परमीत सिंह धुरंधर

सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी


सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।
गम नहीं मुझे अभावों का,
चाहे वन – वन, मैं फिरता रहूँ।
मिटाता रहूँगा मुगलों को,
जब तक निशाँ है धरती पे।
जो झुक गए राजपूत,
उनमे अपने पिता का खून नहीं।
जो टूट गए राजपूत,
उनको अपने खून पे यकीं नहीं।
लहराता रहेगा केसरिया,
जब तक राणा खड़ा मेवाड़ में।
सौ बार लडुंगा हल्दीघाटी,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
जब तक चेतक का साथ रहेगा,
मुगलों से भिड़ता रहूँगा मैं।

परमीत सिंह धुरंधर

पाप और पुण्य


पाप दो तरह से करते हैं. एक जवानी में पाप करके बुढ़ापे में सुधार कर लेते है. ये लोग उच्च कोटि के होते हैं, जैसे वाल्मीकि, रावण, दुर्योधन, अंगुलिमाल डाकू, नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल। दूसरा तरीका होता है पूरी जिंदगी अच्छे रह के बाद में, बुढ़ापे में फंस जाते हैं इस रोग में और मज़ा भी आता है अपने पुण्यों को क्षीण-क्षीण होते देख के. जिद रहती है की हमारे हैं, लूटने दो. मिथ्या पाल लेते हैं की हम ही सर्वश्रेष्ठ। ऐसे लोग ऊचाई से गिरते – गिरते, पतन की उस पेंदी तक जाते हैं जहाँ से कोई पुण्य करने पे भी पुण्य नहीं मिलता। इसे दाग लगा देना कहते हैं. इसलिए पहले के लोग इस तरह का काम होने के बाद आत्मगलानी में या तो घर- संसार छोड़ देते थे या आत्महत्या करते थे या आत्मशुद्धि के लिए प्रयाग जाते थे. ऐसे लोगो की श्रेणी में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वथामा, देवगौड़ा, वी. पी सिंह और नितीश कुमार आते हैं.
आज सारे बुद्धिजीवी लोग दूसरी श्रेणी की महिमा करें में लगे है. पहले के समय में लोग प्रथम श्रेणी के लोगो की महिमा ज्यदा करते थे. हाँ, एक बात कहना भूल गया की एक तीसरी श्रेणी होती है जिसमे सिर्फ एक ही व्यक्ति हुआ, विश्वामित्र, जिसने पाप, पुण्य, फिर पाप करने के बाद फिर पुण्य अर्जित किया.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


शेरो की बस्ती देखी,
बस्ती में शेर देखा।
रिश्तों की कश्ती देखी,
कश्ती में रिश्ता देखा।
दूध के लिए बिलखते बच्चें देखें,
बच्चों के लिए तरसते,
बून्द-बून्द, छलकते दूध देखा।
फटे-चीथड़े आँचल में जवानी देखी,
जवानी में फटा – चिथड़ा आँचल देखा।
२० से २५ तक,
लिव -इन -रिलेशनशिप देखी,
३० के बाद,
शादी को तरसती आँखे देखीं।
प्यार में सबका,
दिल तोड़ती एक लड़की देखी,
और चोट खाने के बाद,
उसको माय चॉइस गाते देखा।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं तब भी लड़ूंगा


जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
आहे भरने की न फुर्सत हो,
ना शिकायत के शब्द गढ़ने की.
जहाँ जिस्म को सावन का,
मन को प्रियतमा का एहसास न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
पग थक गए हो, पर पथ ख़त्म न हो.
आँखे मूंद रही हो, पर मंजिल न हो.
तन से रिस्ते खून को भी बहने से,
रोकने का जब समय न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
ह्रदय में हुंकार तो उठे, पर
आँखों से बहे भी ना बन के धारा।
जब अपनी ही साँसे बोझ लगे,
और कोई न हो सहारा।
जब मेरे बस में ही मेरा वक्त न हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
मैं तब भी आगे बढूंगा,
मैं तब भी चलूँगा।
मैं तब भी लड़ूंगा,
ऐसी कोई ललकार तो हो.
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.
जहाँ जवानी का एहसास न हो,
ए खुदा कुछ ऐसा सितम हो.

परमीत सिंह धुरंधर