भीड़


आँखे, होठ और आगोस किसकी चाहत नहीं,
दुनिया में सबसे बड़ी भीड़ ये ही.

परमीत सिंह धुरंधर

सत्ता


हज़रात की तमन्ना की सरकार बना लें,
सरेआम कोहराम मचा दें.
अगर यकीन न हो तो दे दो सत्ता,
फिर न कहना की आवो थोड़ा आराम फरमा लें.

परमीत सिंह धुरंधर

शिकायत


चंद पलकों की शिकायत,
की हम में कुछ नहीं है,
उनके होठों से मेरे कानो तक,
आते-आते ज़माने गुजर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनौती


रौशनी करो,
दूसरों की जंदगी में.
तभी दुःख मिटेगा,
सामाज से.
उत्सव होगा,
समूह गान होगा.
जैसे उषा के आने पे,
प्रकृति कलरव करती है.
तभी हर इंसान,
प्रयाश करेगा।
जैसे अंधेरो में दुबके,
अपने पंखों को समेटे पक्षी,
पंखो को पसार,
आकाश को चुनौती देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन चक्र


सूरज ने जब तपाया धरती को,
बादलों ने दी शीतलता।
एक बीज कही अंकुरित हुआ गोद में,
वृक्षों ने फिर लीं धरती पे साँसे।
थका-हारा एक राही,
जब छाँव में सुस्ताने बैठा।
तो वृक्षों ने दी उसके साँसों में,
जीवन की एक नई आशा.
जीवन का ये ही चक्र है,
छोटा-बड़ा, कोमल -पत्थर।
एक जीवन दूसरे जीवन से,
एक हाथ, दूसरे हाथ से बंधा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लक्ष्य


सबका हित हो,
सबका कल्याण हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
न किसी का शोषण हो,
न कोई शोषित ही रहे.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
ना कोई बच्चा दूध को तरसे,
ना बूढें अब भोजन को.
शिक्षित – अशिक्षित सबका,
सबपे हक़ अब सामान हो.
किसी एक के आंसू पे,
ना दूसरे का मुस्कान हो.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता


गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
भोले – भाले,
पल में छले जाते हैं,
बेबस, लाचार,
अपने शर्म से मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


मैंने खुदा से पूछा,
की कब तक रखोगे,
इस जालिम जमाने में मुझे.
तो खुदा बोलें,
की अभी ज़माने में,
तेरी चाहत बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चिड़ियाँ


चिड़ियाँ उड़ाने का शौक रखने वालों,
संभल जाओ,
अब शिकारी हो गयी हैं चिड़ियाँ।
घोंसलों में कहाँ ठहरती हैं,
की अब बड़ी आधुनिक हो गयी हैं चिड़ियाँ।
अपने पंखो को संभल के रखती हैं,
पराएं पंखो पे सवार होक उड़ती हैं चिड़ियाँ।
चिड़ियाँ पालने का शौक रखने वालों,
संभल जाओ,
अब चालाक हो गयी हैं चिड़ियाँ।
दाना चुगते – चुगते अब चुग,
जाती हैं इंसान भी चिड़ियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नया दौर


ये दुश्मनी का नया दौर है,
मोहब्बत में इलज़ाम लगाना,
अब शौक है.
कल तक रोती थीं जो मेरी,
पहलु में आने को.
आज मेरी पहलु से जाने,
को बेताब हैं.
एक रात के लिए जो,
अब्बा-अम्मा से लड़ गयी.
एक रात भी अब नहीं गुज़ारेंगी,
ये कह के मुख मोड़ गयीं.
ये वक्त का नया दौर है,
हर रात एक नया शौक है.
बहती गंगा में कौन नहीं हाथ धोता,
आज हुश्न से बड़ा गंगा कौन है.
ये अंदाजे-रुख का नया दौर है,
सबको फ्रेंडशिप का शौक है.

 

परमीत सिंह धुरंधर