द्रौपदी


सुरक्षा की उमीदें पतियों से लगा कर,
द्रौपदी बैठी थी श्रृंगार करने,
युधिष्ठिर से धर्म निभाकर।
अपने सामर्थ्य को भुला दिया,
पिता-भाई के बल को देखकर।
आंसू बहा रही थी,
अधर्मियों को धर्म बता कर।

परमीत सिंह धुरंधर

भारत और औरत


हम रंग देते हैं दीवारों को,
पर मेरे पास कोई घर नहीं।
हम लड़ते है सरहद पर,
मेरे अपनों के पास एक छत नहीं।
हम उपजाते हैं आनाज,
अपने पसीनें को जलाकर।
और हमारे बच्चो को,
खाने को भोजन नहीं।
ये देश है बुध-महावीर का,
भारत इसका नाम है.
जहाँ बिकती है नारियां,
और औरतों का सम्मान नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


सर्द रातों में जब जिस्म कराहता है,
तो गोरे-काले में भेद मिट जाता है.
और जब अतड़िया पिसती हैं भूख से,
तो मंदिर-मस्जिद में भेद मिट जाता है.
बच्चा ढूंढता है बस माँ का स्तन, तब
पशु और इंसान में भेद मिट जाता है.
धर्म और मजहब की लकीर ढूढ़ने वालो,
जब मौत आती है,
गिद्ध नाचने लगते हैं,
तो धर्म का हर भेद मिट जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

काफ़िर और ताज


सुबह के इंतज़ार में रात भर बैठे रहें,
काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो एक दिया तक नहीं जला पाएं.
इनसे अच्छे तो वो हैं,
झूठा ही सही, कुछ ख़्वाब तो देखते हैं.
एक की मोहब्बत में, ताज बना गए,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितनों का पेट कुचल गए.
ऐसी मोहब्बत किस काम की?
उनकी जुल्फों का शौक किस काम का?
वो बदलती है गजरा,
अपने हर रात की शौक में,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितने भौरों को मार गए.

परमीत सिंह धुरंधर

आज की नारी


आज की नारी को बच्चों से ज्यादा सुन्दर जिस्म की चाहत है,
और उनके बच्चों को सेरेलेक्स -फारेक्स से राहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


वो कहते हैं की आमिर का फोटो बल्गर नहीं,
जो खुद किरण राव को बुर्क़े में रखते हैं.
हमें क्या अब सैफ समझायेंगे की मोहब्बत क्या है,
जो मोहब्बत की शुरुआत भी तालाक से करते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

मुर्ख से मोहब्बत


टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धरती भारत की


जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर