परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

ज्ञान


ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.

परमीत सिंह धुरंधर 

एक आशिक़ की इल्तिजा जमाने से: अभी तक अपनी महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ…….


वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

फक्कड़


मैं पीता नहीं हूँ, पर पियक्कड़ हूँ मैं.
मैं बुद्धू ही सही, पर बुझक्कड़ हूँ मैं.
कहीं आता-जाता नहीं, पर घुमक्कड़ हूँ मैं.
मुझे क्या समझोगे, समझने वालों,
मैं फ़कीर नहीं हूँ, पर फक्कड़ हूँ मैं.
मुझे कुछ याद नहीं, कब क्या घटित हुआ,
पर आज भी उनके होठों का चक्कर हूँ मैं.

परमीत सिंह परवाज

जवानी


दिल चाँद बनके आज भी घटता – बढ़ता रहता है,
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.
इतने कांटो से जख्मो को पाकर भी,
ये बागों में जाकर फूलों को चूमता रहता है.
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.

परमीत सिंह परवाज

अतीत का चुम्बन


मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।

 

परमीत सिंह परवाज

गलती


रात के अंधेरे से,
मत डर दिल,
रात में ही तो,
दियें जलते है.
बहती हुई नदियों,
में क्या रखा है,
ठहरे हुए पानी में ही,
कमल खिलते हैं.
ये तो मेरी गलती थी,
तेरी बस्ती में मांगने आ गया,
यहाँ तो दिल भी,
लोग तिजोरी में रखते हैं.

परमीत सिंह परवाज