दिल्ली – सल्तनत


दिल्ली – सल्तनत की एक ही कहानी,
ताकत से तख़्त है, तख़्त से है रानी।
छल से जीतो चाहे बल से जीतो,
धर्म से या अधर्म से जीतो, धुरंधर सिंह
दुनिया करेगी गुणगान तुम्हारा,
और चुम्बन देगी रानी।

मानव – मन


मानव – मन, कितना चंचल,
छन से पल में, पल से छन में,
कभी इस उपवन से उस उपवन,
कभी इस वन से उस वन,
करता है भ्रमण,
मानव – मन.
न प्यास मिटे, न भूख मिटे,
न साध्य सधे, न लक्ष्य मिले,
कसता जाता है, नित-प्रतिदिन,
प्रतिदिन – नित्य एक नया,
लोभ का बंधन,
मानव – मन.
गुरु की बगिया में, प्रेमिका की यादें,
प्रियेशी की बाँहो में, गुरु की तस्वीरें,
उलझता है, मचलता है,
भटकता है, यूँ हीं, लक्ष्यहीन
सारा जीवन, धुरंधर सिंह का,
मानव – मन.

लड़कियां


रात्रि के तिमिर में,
अन्धकार के शिविर में,
जलाई जा रही हैं लडकियां।
सुबह-सुबह खबर आ रही है,
रेडियों पे, दूरदर्शन पे,
अखबार में की,
मिटाई जा रही हैं लडकियां।
३३ % का आरक्षण,
सबकी ये मांग है.
पर, आज भी,
करीना, विपाशा, प्रियंका,
और अब तो आलिया ही,
सबकी चाह हैं.
फिर भी,
घर-घर में सताई जा रही है लडकियां।
पापा के आने पे रो रोटी को,
गरम कर दे खाने को,
भाई के देखते ही जो,
पापड़ – तिलोड़ी छान दे,
ऐसी निपुण होनहार हो के भी,
मेहमान के सामने,
काम बताई जा रही है लड़कियां।
कौन है आज समाज में,
उनके हश्र का कारन, धुरंधर सिंह,
लोग कुछ भी कहते रहे,
मैं तो गिनायें जा रहा हूँ लडकियां।

घास की रोटी


पकाया है तुमने तो,
घास की ये रोटी नही.
अपने हाथो से खिला दो,
फिर ऐसा जीवन नहीं.
कष्ट क्या है धुरंधर राणा को,
जब तक तुम्हारे नयनो में हूँ.
बाहों में सुलो लो अपने,
फिर ऐसी कोई महल नहीं.

राणा


राणा ने संग्राम किया,
न कभी आराम किया।
एक चेतक के साथ पे,
मेवाड़ को आजाद किया.
हल्दीघाटी की वो ऐसी लड़ाई,
हाथी पे बैठे,
अकबर तक भाला थी पहुंचाई।
राणा ने संग्राम किया,
न कभी आराम किया।
राजपुताना के शान पे,
धुरंधर जीवन को,
कुर्बान किया।

अभी तो मैं जवान हूँ


तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब शादी की बात करते हो.
अभी तो मैं जवान हूँ,
और तुम मुझसे ऐसी बात करते हो.
अभी तो मैं खेलूंगी, खिलाऊँगी,
अपनी अदाओं पे सबको नचाउंगी,
अभी तो मैं प्रियंका-कटरीना हूँ,
और तुम मुझसे,
बिपाशा-करीना की बात करते हो.
बेशर्म हो तुम, बेहया हो तुम,
मैं तुम्हे अब क्या कहूँ?
बेगैरत हो तुम.
अभी तो मैं छलकती,
आलिया हूँ.
और तुम मुझमे,
प्रीटी और रानी ढूंढते हो.
तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब तुम धुरंधर,
मुझसे शादी की बात करते हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पुरुषों की गति


अभिलाषाओं ने,
ऐसी कर दी,
पुरुषों की गति.
की कहीं रावण,
हरता है सीता को.
कही पतियों ने दावँ,
पे लगा दी पत्नी।
समर में प्राणों पे,
खेलने वाले,
आँचल को हरने लगे.
और ब्राह्मण भी,
डूब गए वासना में,
भूल कर वेदों की,
धुरंधर संस्कृति।

नारी


एक नारी का,
अपमान हुआ.
वीरो के सभा में,
खुले आम हुआ.
नेत्रहीनो ने भी,
बंद कर ली आँखे.
इंसान का,
ऐसा पतन हुआ.
ससुर-बहु,
पिता-पत्नी,
हर एक रिश्ता,
शर्मशार हुआ.
भारत की पावन,
धरती पे,
वेदो के,
ज्ञानियों के समक्ष,
ब्राह्मणो ने लाज,
मिटा दी.
और,
राजपूतों ने अपना पौरष.
जुल्फों से घसीटा,
एक अबला को,
और,
स्तन पे उसके,
प्रहार हुआ.
जिस तन ने,
सींचा है शिशु को,
उस तन पे,
भीषण वार हुआ.
पतियों ने किया,
पत्नी का,
वय्यापार जहाँ,
सत्ता के,
सत्ताधीशों ने,
न्याय के,
पालनहारों ने,
फिर उसको,
वासना का बाजार दिया.
जब छीनने लगा,
आँचल तन से,
और,
आभूषण उतरने लगा,
न वीरों के सभा,
में किसी ने,
मुख खोला.
न आँगन से ही,
प्रतिकार हुआ.
जब दर्द और,
अपमान से, परमीत
एक नारी ने,
चीत्कार किया.

 

धर्मराज


जहाँ पतियों ने खेली बाजी,
अपनी किस्मत बदलने को,
और दावँ पर लगाया पत्नी को,
बस खुद को बचाने को.
जब हुआ अपमान उस स्त्री का,
तो नजरे झुका ली सबने, परमीत
बस धर्मराज कहलाने को.

बैलों और भैंस म…


बैलों और भैंस में येही अंतर है कि भैंस घांस खुद चर लेती है और बैल को काट के, खल्ली मिला के खिलाना होता है, परमीत.