माया


सब है माया, माया का खेल ही तो रचने आए है.
दो नैना तेरे ए नारी, बस मर्द को छलने आए हैं.
जो हैं बाहों में उनका भी क़त्ल होगा कल,
बस हम बाहों में आने से पहले ही मारे गए हैं.
जिनको यकीन है की ये मेरी, बस मेरी ही बन गयी
इसी यकीन से कितने पहले यहाँ सुलाए गए हैं.

बादल बरसते नहीं है,
बिजलियाँ उन्हें बेचैन कर देतीं हैं
रोने के लिए.
आदमी घर बसता नहीं है
औरत मजबूर कर देती हैं
चारदीवारी में ताउम्र रहने के लिए.

धुप में जितने छावं भी नहीं
उतने उसके पाँव है हसीं।

RSD

नारी भारत की


नारी भारत की
कब तक प्रेम में खुद को बांधोगी?
कब तक सपनों की डोर किसी और के हाथ थामोगी?
वीडा उठा कर
मन को बाँध कर
दुनिया को जीत लो अगर अकेले चलोगी।

RSD

बेड़ियों का सच


हद भी नजर कि तुम बांधते हो
पल्लू भी कमर पे तुम ताड़ते हों.
ये क्या है जो तुम तो चाहते हो
मगर हमें चाहने से रोकते हो.

किताबें भी पढ़कर ना टूटीं बेड़ियाँ
हमें बेड़ियों में तुम यूँ बांधते हो.
तुम तो मोहब्बत में नया जिस्म ढूंढों
और शर्म, हाय, लाज हमपे लादते हो.

दीवारें नफ़रत की तुम गढ़ते हो,
सपनों की उड़ानों को तुम तोड़ते हो।
कभी आग बनते, कभी राख करते,
हमारे ही होने को तुम नकारते हो।

हमारे गीतों को तुम मौन करके,
अपनी ज़ुबाँ पे रखते हो।
तुम्हें मोहब्बत में देह चाहिए, फिर
हमारी आत्मा को क्यों बाँधते हो?

तुम्हारी नज़र में हम गुनाहगार ठहरें,
जो पल्लू थोड़ा सरक जाए तो.
तुम्हारे नियम ये, तुम्हारी ही हदें,
हमारी ही साँसों को क्यों तुम कुचलते हो?

सदियों से लाज का बोझ हम ढोएँ,
तुम हर नजर को पढ़ते हो।
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी,
हमारी पहचान को तुम बुनते हो.

अगर चाहत है, तो खुलकर कहो,
अगर इश्क़ है, तो हमें उड़ने दो।
मगर ये दोगलापन छोड़ दो अब,
हमें जीने दो, हमें साँस लेने दो।

RSD

ऐसा हिन्दुस्तान हो


नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
शहर हो या गाँव हो,
खेत या खलिहान हो।
ना हो पाँवों में बेड़ियाँ,
ना जिस्म पे कोई घाव हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।

आते-जाते नयनों से,
घर का श्रृंगार हो।
उसके मुस्कानों से,
हर एक त्योहार हो।
ना हो डर का साया कोई,
ना अपमान की मार हो।
उसकी इच्छा, उसका सपना,
उसका भी अधिकार हो।

बोल सके वह खुले मन से,
ऐसा संवाद हो।
पढ़े-लिखे हर पंचायत में,
उसके शब्दों का मान हो।
ना हो वो सिर्फ़ रसोई तक,
उसका भी ये संसार हो।
नेता, वैज्ञानिक, सैनिक भी,
हर रूप में वो स्वीकार हो।

दया, और ममता के आगे भी
नारी की तो एक पहचान हो।
शक्ति, प्रेम, करुणा की,
जीती-जागती जान हो।
सीता जैसी सहनशीलता,
लक्ष्मी जैसा दान हो।
दुर्गा जैसी हुंकार भरी,
उसकी भी पहचान हो।
नारी का सम्मान हो,
ऐसा हिन्दुस्तान हो।
जहाँ वो जी सके खुलकर,
ऐसा आसमान हो।

RSD

Silent Screams, Unseen Scars


I scream in my dreams, where no one can hear,
For the tears I suppress when the day draws near.
I chose a man, thinking we’d build our own sky,
But he sought only my body, never asking why.
He won’t look beneath the skin where I hide,
The scars, the fears, the pain inside.

I hide my sorrow from a world so cold,
Afraid they’ll see I’m not strong, not bold.
In silence, I carry this heavy weight,
Longing for love, but finding only fate.

RSD

The Heart and the Mind


The heart’s not made to find love and fall,
But to challenge the mind, yet nourish it all.
The eyes aren’t meant just to gaze on her face,
But to seize the chances others won’t embrace.

Marriage isn’t sharing a bed and a name,
But raising children and shaping a frame—
A world where women walk without fear,
And safety and kindness always draw near.

RSD

Men too


I always wanted to change the world
On my first day on the campus
I saw her giving a speech
How to change the world.

Rest of the life
She spent to change my life
And rest of the life
I spent to change myself
For her happiness.

Finally, we are divorced
Her last sentence was
“The world cannot change.”
“And men too.”

Rifle Singh Dhurandhar

ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये


जिंदगी जहाँ पे दर्द बन जाए
वहीँ से शिव का नाम लीजिये।
अगर कोई न हो संग, राह में तुम्हारे
तो कण-कण से फिर प्यार कीजिये।

राम को मिला था बनवास यहीं पे
तो आप भी कंदराओं में निवास कीजिये।
माना की अँधेरा छाया हुआ हैं
तो दीप से द्वार का श्रृंगार कीजिये।

जिंदगी नहीं है अधूरी कभी भी
तो ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये।
माना की किस्मत में अमृत-तारा नहीं
तो फिर शिव सा ही विषपान कीजिये।

Rifle Singh Dhurandhar

उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?


जिसे खेत में लूट कर तुम नबाब बन गए
उससे पूछा क्या कभी?
उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?
एक चिड़िया
जिसने अभी सीखा नहीं था दाना चुगना
तुम दाने के बहाने जाल डालके
उसका आसमान ले गए.
कई रातों तक देखती थी जो ख्वाब
घोनषलॉन से निकल कर एक उड़ान भरने का
उसके पंखों को बाँध कर
तुम उसका वो सारा ख्वाब ले गए.

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्रीत्व


जल-थल के बिना, नभ का क्या अस्तित्व है
मेरी प्यास ही, तुम्हारा स्त्रीत्व है.

परमीत सिंह धुरंधर