आज की नारी


आज की नारी को बच्चों से ज्यादा सुन्दर जिस्म की चाहत है,
और उनके बच्चों को सेरेलेक्स -फारेक्स से राहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक आशिक़ की इल्तिजा जमाने से: अभी तक अपनी महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ…….


वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

पुरुषों की गति


अभिलाषाओं ने,
ऐसी कर दी,
पुरुषों की गति.
की कहीं रावण,
हरता है सीता को.
कही पतियों ने दावँ,
पे लगा दी पत्नी।
समर में प्राणों पे,
खेलने वाले,
आँचल को हरने लगे.
और ब्राह्मण भी,
डूब गए वासना में,
भूल कर वेदों की,
धुरंधर संस्कृति।

नारी


एक नारी का,
अपमान हुआ.
वीरो के सभा में,
खुले आम हुआ.
नेत्रहीनो ने भी,
बंद कर ली आँखे.
इंसान का,
ऐसा पतन हुआ.
ससुर-बहु,
पिता-पत्नी,
हर एक रिश्ता,
शर्मशार हुआ.
भारत की पावन,
धरती पे,
वेदो के,
ज्ञानियों के समक्ष,
ब्राह्मणो ने लाज,
मिटा दी.
और,
राजपूतों ने अपना पौरष.
जुल्फों से घसीटा,
एक अबला को,
और,
स्तन पे उसके,
प्रहार हुआ.
जिस तन ने,
सींचा है शिशु को,
उस तन पे,
भीषण वार हुआ.
पतियों ने किया,
पत्नी का,
वय्यापार जहाँ,
सत्ता के,
सत्ताधीशों ने,
न्याय के,
पालनहारों ने,
फिर उसको,
वासना का बाजार दिया.
जब छीनने लगा,
आँचल तन से,
और,
आभूषण उतरने लगा,
न वीरों के सभा,
में किसी ने,
मुख खोला.
न आँगन से ही,
प्रतिकार हुआ.
जब दर्द और,
अपमान से, परमीत
एक नारी ने,
चीत्कार किया.

 

धर्मराज


जहाँ पतियों ने खेली बाजी,
अपनी किस्मत बदलने को,
और दावँ पर लगाया पत्नी को,
बस खुद को बचाने को.
जब हुआ अपमान उस स्त्री का,
तो नजरे झुका ली सबने, परमीत
बस धर्मराज कहलाने को.

मानसिकता


कबूतरों के राज्य में राजा कबूतर ने नए उतराधिकारी को चुनने के लिए बुद्धिमान कबूतरों की सभा में चर्चा की. उनके राज्य में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं था. सभी सामान थे, लेकिन राजा  बन ने के लिए एक शर्त थी की उतराधिकारी कभी झूठ ना बोले. यहाँ तक की राजा बन ने के बाद भी. कठिनाई ये थी की दोनों उमीदवारों ने कभी झूठ बोला ही नहीं, तो राज्य किसको दिया जाये? नए कबूतर राजकुमारी को चाहते थे, उन सबने  उनके लिए मत दिया. बहुमत ना बन पाने की दृष्टि में राजा  ने गुरु से परामर्श किया. गुरु मुस्कराय और राज्य राजकुमार को दे दिया. प्रश्न ये उठता है की क्या राजगुरु सही थे या उन्होंने गलत किया पुरुष प्रधानता की मानसिकता के तहत बंध  कर……परमीत

चरित्र


ना पूछ मुझसे,
कितना पतन हुआ है,
इस देश में चरित्र का.
जहां सीता बनी ही शर्लिन ,
और सनी रूप है सावित्री का, परमित.

बलात्कार


बलात्कार एक  शब्द  नहीं ,
एक  दर्द  बन  गया  है ,
भारत  की  जमीन  का ,
एक  रंग  बन  गया  है .
खेल  था जहां  Crassa,
बालिकावों संग  होली ,
वो  होली अब , उन  बालिकावों
के  दिल का  डर बन  गया  है, परमीत.