धुप में छावं की गरज किसको नहीं
जिस्म हो जवान तो तलब किसको नहीं
समझती ही नहीं है इश्क़ को लड़कियाँ
चाहती है सलमान जो आज तक हुआ किसी का नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
धुप में छावं की गरज किसको नहीं
जिस्म हो जवान तो तलब किसको नहीं
समझती ही नहीं है इश्क़ को लड़कियाँ
चाहती है सलमान जो आज तक हुआ किसी का नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
शर्म – लज्जा वस् मैं तट पे ही रही
उसका निर्वस्त्र – मग्न
लहरों से खेलना, लहरों में तैरना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
दरिया में आगा लगा दूँगा
दर्पण में ख्वाब जगा दूँगा
ऐसी बाजीगरी के हुनर
रखता हूँ इन हाथों में
तू बस घूँघट तो उठा
मैं शर्म – हया सब चुरा लूँगा।
तितलियाँ चतुर हैं, चंचल हैं
उड़ जाती हैं दो पल बैठ के
मगर दो पल तो बैठे मेरे पास
चुपके से पावों में
पायजेब पहना दूँगा।
रहस्य से भरे हैं लोग यहाँ
एक मैं ही दिल का खुला हूँ
तू एक पल को तो
दिल लगा के देख
मैं सारी उम्र उसी पल में
गुजार दूँगा।
शहर भर से मत पूछा कर
मेरे अतीत के किस्से
तू श्री गणेशाय: तो कर
मैं धीरे – धीरे तुझे
सब सुना दूँगा।
परमीत सिंह धुरंधर
वो अपनी बाहों में समंदर रखती हैं.
तभी तो इस गरीबी में भी गुरुर रखती हैं.
ना जिस्म पे सोने – चांदी के गहने
ना लाखों – हजारों का श्रृंगार ना कपड़े
मगर राजा, रंक सभी नज़ारे गराये हैं उसपे
जाने क्या?
मैंले – कुचले, फटे – चिथड़े
अपने दुप्पटे में वो रखती है.
परमीत सिंह धुरंधर
नशा पीने से हो या पिलाने से हो
नशा होना चाहिए।
दर्द सीने में हो या जीने में हो
दर्द होना चाहिए।
इश्क़ कुवारी से हो या विवाहित से हो
इश्क़ होना चाहिए।
परमीत सिंह धुरंधर
वो जो मुझे तन्हा कर गयी
अब अपनी तन्हाई का जिक्र करती हैं.
दो पल में ख़त्म हो जाते हैं उनके सारे किस्से
और मेरे संग के दो पल का घंटों जिक्र करती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे नजर का जो मिलना हुआ
पतली कमर का सिहरना हुआ.
कैसे सँभालते साँसों को हम?
नस-नस में उनका ऐसे उतरना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ ने तन्हा कर दिया उम्र की बंदिशे लगाकर
उनकी पावों में पायजेब दे दिया मेरी नींदे उड़ाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
सर पे बाल नहीं, मुँह में दांत नहीं
अंगुलियाँ भी कपकपा रही है मेरी
पर कैसे कह दूँ तुझसे मिलने के बाद?
तू अब भी मेरी खास नहीं।
माना की नजर कमजोर हो गयी है दूर की
माना की बालों पे सफेदी आ गयी है तुम्हारे, उम्र की
पर कैसे कह दूँ तुम्हे देखने के बाद?
सीने में उठता अब कोई तूफ़ान नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
सर्वदा – सर्वदा
बहती रहो धरा पे
नर्मदा – नर्मदा।
सम्पूर्ण करती हो भारत को
यूँ ही सम्पन करती रहो भारत को
गंगा – जमुना,
ताप्ती – गोदावरी – नर्मदा।
तुम्हारे ही तट पे रचे गए
वेद-उपनिषद-पुराण
तुम्हारे ही धाराओं से
उत्पन हुए ऋषि – मुनि – विद्वान।
सदियों से कर रही हो
भारत को परिभाषित
यूँ ही बनी रहो भारत की परिभाषा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
युगो – युगो से
पाल रही, पोस रही
सृष्टि को इस धरती पे
युगो – युगो तक यूँ ही माँ
करती रहो सबपे कृपा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
परमीत सिंह धुरंधर