फिर उठ न सके चारपाई से


वो जो कल तक गले लगाते थे महफ़िल में उछल कर
आज हँसते हैं मेरी हर रुस्वाई पे.

हुस्न समझता ही नहीं इश्क़ में
की मौत अच्छी है उसकी बेवफाई से.

ऐसे टूटा इश्क़ में की पिता भी रो पड़े
दर्द ही ऐसा था, फिर उठ न सके चारपाई से.

मुझे मंजिल मिले या ना मिले खुदा
किसी और को ना दिखाना आइना उसकी बर्बादी के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ नहीं करता तन्हाई में


हर तन्हा इश्क़ नहीं करता तन्हाई में
हर मोहब्बत की मंजिल नहीं सजती है शहनाई से.

तुझे क्या पता कैसे सजा के रखा है यादों में तुझे?
हर दर्द ब्यान नहीं होता आँखों की रुलाई और शब्दों की गहराई से.

लड़ेंगे हम आखिरी साँसों के दम तक
इतिहास नहीं बनता सिर्फ जीत की मिठाई से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ए दुश्मन


ए दुश्मन तेरी आँखे मुझे पसंद बहुत हैं
अपने मुखड़े से ये घूँघट निकाल दे.
सुना है तेरी लबों को लहू की चाहत बहुत है
तू चाहे तो मेरे जिस्म से मेरा दिल निकाल ले.

सुना है की तेरे चर्चा में जिक्र आ जाता है मेरा
तू चाहे तो मेरी गर्दन अपने दर पे बाँध ले.
तू बस गया है सरहदे – जमीन से जाकर दूर
तू चाहे तो मेरे जमीन पे और कहर बरपा ले.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सालों से बैचैन है दिल


दौलत कमा के देखिये
शौहरत कमा के देखिये
जो मिट जाए दर्दे-दिल
तो हमको बता के भी देखिये।

सालों से बैचैन है दिल
बिना सुकून के एक पल भी.
जो कोई दवा या दर पता हो आपको
तो हमपे आजमा के भी देखिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कैसे ज़िंदा हूँ सालों से?


ज़िंदा जिस्म है, रूह नहीं
तनहा रूह है, जिस्म नहीं।
मैं कैसे ज़िंदा हूँ सालों से?
आके देख ले.
साँसे चल रहीं है, दिल नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी शोहरत को इससे भी अधिक क्या चाहिए?


परिंदों को आसमा से अधिक क्या चाहिए?
बहारों को गुलिस्ता से अधिक क्या चाहिए?
दिल है मेरा, ये कुछ भी नहीं माँगता
तुझसे तेरी एक नजर के अधिक क्या चाहिए?

संभाल लेंगे खुद को तेरी जुदाई में
बस एक जिंदगी है पास,
चंद साँसों से अधिक क्या चाहिए?
दर्द आंसू में बदल जाए ऐसा भी नहीं होगा
मोहब्बत में तुझे इससे भी अधिक क्या चाहिए?

देखना सेज पे कहीं मेरी याद ना आ जाए
अब दुआओं में इससे अधिक क्या चाहिए?
सलामत रहे तेरी जवानी यूँ ही
अब इस शहर को इससे अधिक क्या चाहिए?

प्यास यूँ ही रहेगी लबों पे मेरे
तेरे मयखाने को इससे अधिक क्या चाहिए?
हर दौलत संभाल के रखी है एक रुमाल में बाँध के
मेरी शोहरत को इससे भी अधिक क्या चाहिए?

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक इतना क्यों रखते हों?


शौक इतना क्यों रखते हों?
जब संभाल नहीं पाते हो कमर को.
नजर से ही छू लिया करो
क्यों बे – बजह कपकपाते हो उँगलियों को.
उम्र भर का साथ
जब मिटा ना सका तुम्हारी प्यास को.
बिना दांतों के क्यों व्यर्थ परिश्रम करते हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इसे मत समझों अय्यासी मेरी तुम


जब जवानी मिली तो गुनाहों में डाली
जब बुढ़ापा आया तो पैगम्बरों की छानी।

अब जब मिटने के कागार पे हूँ दोस्तों
तो लबों की प्यास बुझाने की ठानी।

इसे मत समझों अय्यासी मेरी तुम
नादान मैंने अब जाके जीवन, जीने की चाही।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लबों पे अपने बस बांसुरी ही रखता हूँ


मैं अपनी उमिद्दों का समंदर रखता हूँ
तन्हा हूँ मगर मैं यही शौक रखता हूँ.

शहनाइयाँ तो कितनी हैं बाजार में
मगर मैं लबों पे अपने बस बांसुरी ही रखता हूँ.

ना उम्मीदी के इस दौर में जो ज़िंदा है वही राजपूत
तख़्त ना सही पर रगों में वही लहू रखता हूँ.

वो गैरों के बाहों में झूल गयीं जाने किन ख्वाइशों के तले
मैं आज ब्रह्माण्ड के कण – कण पे अपनी शौहरत रखता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उसे सुबह में हेलो भी नहीं बोल पाया


टूट कर भी मैं बिखर नहीं पाया
मौला जाने कैसी हसरत थी तेरी?
जिसे चूमा जी भरकर रातों को
दिल छोड़िये,
उसे सुबह में हेलो भी नहीं बोल पाया।
मौला लिख रहा है जाने तू कैसी जिंदगी?
आज तक रातों को मैं सो नहीं पाया।

 

परमीत सिंह धुरंधर