आवतारन सैयां सखी आज टेम्पू से


कटले बानी आज छाली
सजाव दही के.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

खिलायेम आज भरपेट
दाल में घी दाल के.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

बानी आज नहईले
आज सेम्पु से.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

अंग – अंग कसके बानी तैयारी
नया चोली में.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

बात भइल रहल
कंजूस Crassa से.
आवतारन सैयां
सखी आज टेम्पू से.

These lines were inspired by the Bhojpuri song  https://www.youtube.com/watch?v=dMoEE-Ln4dk

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा खुदा है इन निगाहों में


कभी मिलावो नजर भी
मेरा खुदा है इन निगाहों में.
खुद ही समझ जाओगी तुम
क्यों चर्चा है मेरा इस जमाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खोलीं किवाड़ के


तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.
जागल होईअन सास अभी
दे वे लागियन आवाज रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

सगरो से दुखाता
सारा ई देहिया।
अब जे उठेंम
त चढ़ जाई बुखार रे.
तानी धीरे – धीरे सैया
खोलीं किवाड़ के.

बाटे रउरा से प्यार बहुत
ना त टिकती ना इ सुखल – ससुरा में.
मुँह बंद करके धीरे – धीरे सैया
चढ़ी खटिया पे.
बाबू जी ढूढ़तारन सुबहे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

377 से 370


आज जब राहों से
गुजर रहा था
तो फूलों की पंखुड़ियों ने पूछा
इस शहर में अब भौरें नहीं है क्या?
मैंने कहा
भौरें तो हैं, मगर अब 377 नहीं हैं यहाँ।

इतने में कौवों का एक समूह
उड़ता हुआ आया और बोला
तो कश्मीर से दाना हम भी चुग आये क्या?
मैंने कहा, ” काश्मीर से दाना, क्यों?”
यहाँ दाना नहीं मिलता क्या?
कौवें बोले वो 370 के कारण
काश्मीरी कौवें तो चुगते है दाना
घूम – घूम कर, उड़ – उड़ कर
पर हम पे प्रतिबंध है वहाँ।

मैंने कहा की हजूर
377 हटी है 370 नहीं।
कौवें बोले की ये क्या माजरा है?
इंसान चाँद पे पहुँच गया
और गिनती भूल गया.
दुनिया को जीरो देने वाला
आज खुद
377 हटाने से पहले 370 भूल गया.

इंसान भी गजब है
कौवों को धोकेबाज पक्षी कहते हैं.
और खुद मैनिफेस्टो में कुछ लिखकर
सरकार ने कुछ कहा
और कानून कुछ और ला दिया।
सदियों से चली आ रही कहावत
“कौवा चला हंस की चाल ……”
अब कोई इसे इंसानों पे आजमाए।
भाजपा चली कांग्रेस की चाल
70 – 70 बोल के 77 का
लगा गयी भाव.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चॉकलेट के रैपर कहाँ छुपाएं


आदत उनकी हम से ही बिगड़ी है
चॉकलेट के रैपर कहाँ छुपाएं?

मम्मी कुछ भी समझती नहीं है अब
सखियों में अपने हम किसके किस्से सुनायें?

पूरा है फोकस अपने कैरियर पे मेरा
मगर अंतर्मन में दिया किसके नाम का जलायें।

डोली न जाने कब उठेगी मेरी?
मन की मीरा को फिर किसका भजन सुनायें?

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहाँ फिर t-test लगायें?


नजर ही नजर को
जो दे दे हाँ धोखा
तो दिलों में फिर
कैसे घर बसायें?

चेहरे सारे ही यहाँ
बड़े मासूम हैं
फिर कैसे हम?
किसी की सीरत बतायें।

मोहब्बत क्या है?
बस एक probability है
अब शादी के बाद कहाँ?
फिर t-test लगायें।

हमें भी पता है
ये एक नुक्लेअर डील है
चाहे जितना भी हम
क्यों ना
0.99999 का correlation दिखायें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

राजपूतों का अहंकार


दौर तुम्हारा हो सकता है
शौर्या तुम्हारा नहीं।
कलम तुम्हारी हो सकती है
इतिहास तुम्हारा नहीं।
वक्त तुम्हारा हो सकता है
मेरा दम्भ तुम्हारा नहीं।
सत्ता तुम्हारी हो सकती है
मगर राजपूतों का अहंकार तुम्हारा नहीं।
विश्व को जीत सकते हो तुम
पर राजपूतों की जितना, वश में तुम्हारे नहीं।

जीवन का सार


अपनी – अपनी जिंदगी में
अपना – अपना ख्वाब है.
तुम चाहो तो साथ चल लो
वरना अकेला ही ये संसार है.

छोटी सी उम्र में ही
अब चेहरे पे तनाव है.
तुम चाहो तो इसे हर लो
वरना जीवन का यही सार है.

प्रेम कहाँ सच्चा?
सब धोखा और व्यापार है.
तुम चाहो तो ये सौदा कर लो
वरना लम्बी यहाँ लगी कतार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत करें पनियाडीह से Harvard Medical School तक


आवो चलें मोहब्बत करें
उस दरिया के किनारे पे
जहां कृष्णा ने चुरा लिए थे
गोपियों के कपड़े।

आवो चलें मोहब्बत करें
हिन्द की उस सरहद पे
जिसे सींचा हैं
राजपूतों ने अपने रक्त से.

आवो चलें मोहब्बत करें
बिहार की उस धरती पे
जहाँ गुरु गोविन्द सिंह जी
अवतरित हुए
हिन्दू धर्म को बचाने।

आवो चलें मोहब्बत करें
पुणे शहर में
जहाँ प्रसिद्ध है अब भी
प्रोफेसर सीताराम के किस्से।

आवो चलें मोहब्बत करें
सिवान – छपरा की गलियों में
जहाँ गूजतें हैं आज भी
महेंद्र मिसिर – भिखारी के गानें।

आवो चलें मोहब्बत करें
पनियाडीह के खेतों में
जहाँ आज भी हरे – भरें हैं
धुरंधर सिंह के बगीचे।

आवो चलें मोहब्बत करें
Harvard Medical School में
जहाँ पागल है Crassa
प्यासा प्रेम में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुरु गोबिंद सिंह जी


हिन्द की धरती पे जब उलझनों का दौर था
अस्त था सूरज और तिमिर घनघोर था.
सरहदों से अंदर तक आतंक का जोर था
अधर्म बलवान और धर्म कमजोर था.
एक नन्हे से बालक ने कहा पिता से
भय से बड़ा न कोई रोग है, न रोग था.

आतंक का मुकाबला अहिंसा तो नहीं
भय अगर व्याप्त है
पर्यावरण में किंचित भी
तो उसका समाधान मंत्रोचार और दया तो नहीं।
बलिदानों की इस धरती पर
यूँ समर्पण बस प्राणों के मोह में
एक कोढ़ है और कोढ़ था.

 

परमीत सिंह धुरंधर