कवि


ए कवि, तेरे चेहरे पे
एक ग़ज़ब का नूर है।
तू ग़रीब, पर तेरी हस्ती बेजोड़ है।
एक छोटी-सी मुस्कान पे हुस्न के
तूने लिखी कितनी अदाओं की दास्ताँ।
आज ज़माने में हर तरफ़ बस
बिक रहा है सजने का सामान।

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<blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>In a new <a href=”https://twitter.com/NAR_Open?ref_src=twsrc%5Etfw”>@NAR_Open</a&gt; study, <a href=”https://twitter.com/DanaFarber?ref_src=twsrc%5Etfw”>@DanaFarber</a&gt; researchers led by <a href=”https://twitter.com/meioticdrrive?ref_src=twsrc%5Etfw”>@meioticdrrive</a&gt; reveal how foamy virus (FV) targets DNA based on replication timing and chromatin structure.<br><br>Read more: <a href=”https://t.co/UF4IbcTSGi”>https://t.co/UF4IbcTSGi</a&gt; <a href=”https://t.co/pmw4KXMzXB”>pic.twitter.com/pmw4KXMzXB</a></p>&mdash; Dana-Farber News (@DanaFarberNews) <a href=”https://twitter.com/DanaFarberNews/status/1932807537780215958?ref_src=twsrc%5Etfw”>June 11, 2025</a></blockquote> <script async src=”https://platform.twitter.com/widgets.js&#8221; charset=”utf-8″></script>

बेसकीमती


सब कुछ तो दे दिया खुदा ने औरत को
फिर भी औरत जाने क्या ढूंढती हैं.
हम्मे है लाख कमियां पर ठहर गए तो
फिर कोई कमी नहीं रहती है.

जा मुस्करा ले मेरी बेबसी पे
तेरी मुकर्राहट बेसकीमती हो गयी.

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हिज्र


इश्क़ के तमाम रंग फीके पड़ गए
दर्द में दिल को जब मैंने सजाया।
जब तक वो मेरी थी मैंने चूमा जिस्म को
इस हिज्र के बाद, वो बन गया मेरा साया .

उम्मीद का कोई अंत नहीं
जंग में वो दम नहीं।
हार रहा है इश्क़ मेरा
फिर भी है ये यकीन
की वो मिलेगी किसी मोड़ पे एक दिन
बनकर मेरी, बनकर मेरी।

ना दिल रख किसी के नाम का
ना शौक कर किसी जाम का
तन्हाई में तो मांगते हैं सब
सिर्फ जिस्म, और जिस्म हाँ.

दुरी तो सित्तारों में भी है
चाँद भी तनहा है, ये सच है
तो बदनाम क्यों हैं ?
सिर्फ मेरा बिहार हाँ.

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काली आँखें-2


हैं जो ये काली आँखें, करती हैं शरारत,
मैं पीता हूँ फिर भी, मुझे मिलती कहाँ है राहत।
कई रात गुज़ारी मयख़ाने में सोकर,
पर हर जाम पे आती है तुम्हारी आहट।

लबों पे हँसी है, मगर दिल में सिसकियाँ,
हर कूचे, हर मोड़ पे बसी है तुम्हारी चाहत।
मैं पी भी लूँ ज़हर तेरे नाम का हँस के,
मगर तू जो ना हो, तो लगती है वो भी कसरत।

तेरी यादें हैं जैसे खुशबू पुरानी,
हर सांस में घुलती है मीठी सी उलझन।
मैं टूटे ख्वाबों का प्यासा मुसाफ़िर,
तेरे नक्श पे रखता हूँ दिल की इबादत।

कभी तो सुन लेगी तू भी इस सन्नाटे को,
जहाँ हर लम्हा करता है तुझसे शिकायत।
मैं लिखता रहा अशआर तेरे नाम के,
तू समझी ही नहीं, ये मोहब्बत की ताक़त।

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काली आँखें


हैं जो ये काली आँखें, शरारत करती हैं
बात-बात पे चुपचाप इबादत करती हैं।
कभी कह दें बिना बोले ही सारी दुनिया,
कभी खामोश रहकर भी बगावत करती हैं।

इनमें छुपे हैं कई अधूरे अफ़साने,
जिन्हें पढ़ने की चाह हर दिल में पलती है।
कभी बरसें घटा बनके सावन जैसी,
कभी मुस्का के दिल की सियासत करती हैं।

जब मिल जाएँ किसी अपने की नज़रों से,
तो ये आँखें सजी संजीवनी बन जाती हैं।
और जब रूठ जाएँ ये पलकों के पीछे,
तो हज़ारों रातें सज़ा बन जाती हैं।

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Silent Screams


I scream in my dreams, where no one can hear,
For the tears I can’t shed when the day draws near.
I hide my pain from the world so cold,
Afraid they’ll see that I’m weak, not bold.

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किताबों की दुनिया


जिनको भी मिलीं हैं किताबों की दुनिया
वो ना शहर के रहें, ना सहर के रहें।
जंग रही उनकी सदा अंधेरों से
मगर ना वो रौशनी के रहें , ना चांदनी के रहें।
बहुत दिन तक हम भी इसी गुमान में रहे
पर अंत में ना खुदा के रहें, ना महबूबा के रहें।

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रघुनन्दन


भक्त की पुकार को अब तो सुन लो हे रघुनन्दन
भक्त का संसार हो आप हे रघुनन्दन।
चरण-रपर्श मात्र से तर गयी अहिल्या पत्थर से
भक्त का भी अब उद्धार करो हे रघुनन्दन।
ब्रह्माण्ड में कुछ भी कठिन नहीं, जिसके ह्रदय में आप हो रघुनन्दन
हनुमान जी के साथ फिर मेरे ह्रदय में विराज करो हे रघुनन्दन।

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शौक समंदर का


शौक समंदर का मुझे लहरों में ले गया
साहिल से दूर मझधार में ले गया
सल्तनत ना रही मेरी पर दर्प-गर्व वही है
राजपूत होने का अंश और गंभ वही है.
हार-जीत गोरो को बदल सकती है
पृथ्वीराज निर्भय है, और अब भी वही है.

जीवन पे मौत का भय कैसा?
उबाल हो नशों में तो फिर पड़ाव कैसा?
अमृत की मोह में परिश्रम का क्या मोल
गरल का पान शिव को नीलकंठ बना गया.

RSD