ख्वाब


हर ख्वाब के टूटने पर
एक समंदर बनता है.
कोई बहा देता है आँखों से
कोई दिल के अंदर रखता है.

मोहब्बत तो बस एक दरिया है
कोई डूब-डूब के पीता है
और कोई पी – पी के डूबता है.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


सफर कीजिये
किसी के साथ मगर.
क्या पता कब जरुरत पड़ जाए?

गुरुर कीजिये जवानी पर
शादी के बाद मगर.
क्या पता कब आपकी जवानी
किसी के हाथों का खिलौना बन जाए?

परमीत सिंह धुरंधर

संवर – संवर कर आईने में


संवर – संवर कर आईने में
यूँ इठलाया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

ढल जाएगा जब तुम्हारा
ये गोरा बदन.
मुख मोड़ लेगा आइना
भी तुमसे सनम.
तो ऐसे हरजाई से
दिल लगया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

झूलते हैं पंक्षी
जिन शाखाओं पे
सावन में.
छोड़ते नहीं उन्हें कभी भी
पतझड़ में.
तुम यूँ उन्हें जाल में
फंसाया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भीष्म और बरगद


मेरी लड़ाई
मेरे अस्तित्व की नहीं
मेरे अंतरात्मा की बन गयी है.
मेरे सही या गलत की नहीं
मेरे विश्वास की बन गयी है.

मैं जानता हूँ
की मैं टूट रहा हूँ
पिछड़ रहा हूँ
थक रहा हूँ
पर इन सबके बावजूद
मेरा टीके रहना जरुरी है
उस बरगद की तरह
जिसके नीचे क्या ?
दूर – दूर तक कोई और पेड़ – पौधा
नहीं होता।

जी हाँ जब जिंदगी आप की
बरगद हो तो
लोग दूर -दूर ही रहते हैं
की कहीं विकास ना रुक जाए.
कहीं भुत – पिचास न पकड़ ले.
ये तो वो ही इनकी छावं में आते है
बैठते हैं
जो मुसाफिर हों, राही हो
जिनकी मज़बूरी है थकान मिटाने की.
या फिर प्रेमी-युगल हो
जिनकी मज़बूरी हो निवस्त्र हो कर भी
एक वस्त्र या चादर के आड़ की.

बरगद, जिसके कोई करीब नहीं
बरगद, जिसके फल की किसी को चाह नहीं।
बरगद, जिसके गिरने पे आँधियों में
एक धाराम सी आवाज होती है
और गावं समझ जाता है
और जब गिरता है बरगद तो
या तो रात का अँधेरा और सनाटा होता है
या फिर ऐसा तूफ़ान जो दिन में भी
सबको घरों में छिपने को विवस कर दे.

तब उस अँधेरे से और उस तूफ़ान से सिर्फ
वो बरगद ही जूझता है.
और वो गिरना भी देखिये
की उसी पल से लोग उत्सव मनाते हैं
बच्चे उछाल -उछाल कर लांघते हैं
विजय-उल्लास की तरह.
और लोग ज्यादा -ज्यादा धो लेना चाहते हैं
उसे चूल्हे या अलाव में लगाने को.
गिरना भी ऐसा हो और मौत भी ऐसा हो
की जन-सैलाब उमड़ उठे.
भीष्म की सैया पे
पांडव – कौरव क्या?
कर्ण, दुर्योधन, गांधारी, धृतराष्ट,
ही नहीं
स्वयं जगत के पालनहारी
कृष्णा कराह उठे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास रक्तपात की


रक्त की हर बून्द में प्यास रक्तपात की
वो राजपूत नहीं, जसके आँखों में ख्वाब नहीं
कुरुक्षेत्र में शंखनाद की.

जो लोट गए हैं अकबर की चरणों में जाकर
उनके नस – नस को एहसास नहीं
राजपूतों के इतिहास की.

परमीत सिंह धुरंधर

मेघनाथ तैयार है


तेरे अंग – अंग पे अधिकार करने को
मन व्याकुल है रानी तुझे प्यार करने को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है युद्ध आरम्भ करने को.

माना की विष्णु के सखा हैं वो
माना की अजर और अमर हैं वो.
मगर दम्भ मेरा भी उछाल मार रहा
उनको आज यहाँ परास्त करने को.

सोख लूंगा समस्त क्षीरसागर को
अपने तीरों से बांधकर शेषनाग को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है त्राहिमाम करने को.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


कभी वक्त न रहा अपना
कभी वो न रहीं
ऐसे ही संभालता रहा जिंदगी।

कभी लगा भी नहीं की
यों फिसल जाएगा वक्त
और बिखर जायेगी जिंदगी।

अब अपने ही फैसले
अपने ही विरोध में खड़े हैं
क्या दोराहा, क्या चौराहा?
बस उलझ के रही गयी जिंदगी।

चढ़ी जब जवानी
तो नचा के रख दिया
जवानी ऐसे ढली
की बुढ़ापे का दर्द बन गयी जिंदगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

धुरंधर के बाहों में रायफल


पिता पे पुत्र का घमंड तो बनता है
जवानी में ये मद तो बनता है.
यूं ही नहीं है धुरंधर के बाहों में रायफल
इस विरासत पे दम्भ तो बनता है.

परमीत सिंह धुरंधर

तू दिख जाए


यूँ ही रातें कटती नहीं हैं मेरी,
तू दिख जाए तो देखती है मौत मेरी।

परमीत सिंह धुरंधर

सृजन


हर पल में इरादों का
बिखंडन होता है.
हर पल में इरादों का
सृजन होता है.
फिर क्या गम है?
किसी के खोने का.
हर पल – हर क्षण में सृष्टि में
कुछ – न – कुछ नव-निर्मित होता है.
वीर वही जो ना विस्मित हो
ना अचंभित, ना भ्रमित हो
प्रभु शिव के तांडव से ही
सृष्टि का श्रृंगार होता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर