वो इंतज़ार कहाँ इन शहरों में?


मेरा गली – गली में भटकना,
वो मज़ा कहाँ तेरे शहरों में?
मैंने पकड़े हैं कई चिड़ियाँ,
ताल – तलैयाँ और मुंडेरों पे.
वो चिड़ियाँ कहाँ बसते हैं?
हाँ तुम्हारे शहरों में.

मेरा वो निकलना साँझ ढलें,
और उनका छज्जे पे आना.
वो कंघी का करना सवरें बालों में,
और मेरा घंटों तकते रहना।
वो दीवारें प्रेम में,
कहाँ तुम्हारे शहरों में?

यहाँ मदिरा है, पान है,
पर वो ताड़ी कहाँ इन शहरों में?
यहाँ महफ़िल है, प्यार है,
पर वो इंतज़ार कहाँ इन शहरों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ


तेरी काली – काली आँखों में हम काजल बनकर बह जाएँ,
तेरे गोरे – गोरे गालों पे कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ.
इस देश – सीमा के विवादों से दूर, तुझे लेके कहीं बस जाएँ,
मेरे नन्हें – मुन्नें चार, मेरा नाम लेकर, हर सुबह तुझसे लिपट जाएँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू उड़ती है कैसे?


ए चिड़िया,
तू उड़ती है कैसे?
नन्हें परों पे हौसला लेकर।

सुबह – सुबह निकल आती है,
सबसे पहले अपने घोसलें से.
जाने क्या ढूंढती है?
तुझे क्या मिलता है?
यूँ चहक – चहक कर,
गुंजन करने में.

ए चिड़िया,
तू फुदकती है कैसे?
बाज के शहर में,
यूँ निडर होकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें


कुछ नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें उनकी,
कुछ दर्जी का दोष है, कुछ उनकी जवानी का.
यूँ ही नहीं निकलते हैं लोग गलियों में,
कुछ गर्मी का असर है, कुछ उनकी जवानी का.
और कब तक बांधें वो भी लज्जावस अपनी साँसों को,
कुछ मेरी बाहों का असर है, कुछ उसकी जवानी का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खाता सतुआ और नून हूँ


हुश्न का मैं शौक़ीन हूँ,
खाता सतुआ और नून हूँ.
जिला है छपरा,
बिहारी मगरूर हूँ.

दोस्तों की कमी है,
दुश्मनों की भीड़ है.
सबके दिलों में बनके,
एक गाँठ मौजूद हूँ.

बस वक्षों पे मेरा निशाना है,
कहती सब मुझे कमीना हैं.
किसी की नफरत में,
तो किसी की चाहत में,
रखता वजूद हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

श्री कृष्णा


मैं खेलता ही नहीं,
खेलता भी हूँ.
मैं डीप जलाता ही नहीं,
दीपमाला बनाता भी हूँ.

यूँ ही नहीं कहते सभी,
मुझे मायावी और छलिया।
मैं पालता – पोसता ही नहीं सृष्टि को,
इसको नचाता भी हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बाँध लो खटिया और हो जाओ तैयार जी


सुन लो ए VC जी,
बाँध लो खटिया और हो जाओ तैयार जी.
जब छिड़ गयी है जंग तो भीषण होगी,
तांडव होगा शिव का और बिनाश भी.
कल तक चुप थे ये थी गलती हमारी,
अब ना सहेंगें तुम्हारे तुगलकी फरमान जी.
ये धरती है बुद्ध और महावीर की,
ये धरती है सीता और गुरु गोबिंद की.
प्राणों पे खेल कर इसे संवारा है,
ना फैलने देंगे अधर्म और पाप जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये धरती है बिहार की साहब


माना सत्ता पे बैठे सत्ताधीशों की नजरें बाज सी होती है,
पर ये धरती है बिहार की साहब,
यहाँ की हर चिड़इयाँ सौ – सौ बाजों पे भारी है.
जब भी गहन निंद्रा में सो जाता है कोई अपने मद और दम्भ से,
तो ये धरती है बिहार की साहब,
यहाँ का एक शिक्षक वैसे सौ – सौ महानंदों पे भारी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ख्वाब अधूरें हैं


मुझसे तुम्हारे दिल के,
माना की जज्बात अधूरें हैं.
कई रातों से जल रहा है जो दीपक,
उसके तो अब तक, सारे ख्वाब अधूरें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इंतज़ार


समुन्द्र अभी तक प्यासा ही है,
किनारों ने ऐसे बाँधा है.
तुम्हारा इंतज़ार है हमें जन्मों से,
मेरी साँसों ने ऐसे तुम्हे छुआ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर