२०२४ में चलो लेले सात फेरें
दुनिया को छोड़ो, हम रहेंगे साथ
दिल-दिमाग और जिस्म, २४क्स जोड़े।
RSD
२०२४ में चलो लेले सात फेरें
दुनिया को छोड़ो, हम रहेंगे साथ
दिल-दिमाग और जिस्म, २४क्स जोड़े।
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शहर में सभी को कुछ न कुछ मिला
मेरा नाम ले के उनको बहुत कुछ मिला
फिर भी गिला रखती हैं वो हम ही से
की सारे शहर में उन्हें मोहब्बत फिर कहीं ना मिला।
बदनाम खुद हुईं और हमपे तोहमत लगा गयी
की जिंदगी में उन्हें फिर कोई हम सा क्यों ना मिला?
जिंदगी क्या है?
नदी, ताल, तलैया, बहते जाना है
प्रेम क्या है?
दुःख, दर्द, काँटा, सहते जाना है
हुस्न क्या है?
छल, फरेब, धोखा, बचते जाना है.
बिहार क्या है?
घी, लिट्टी पे चोखा, खाते जाना है.
घी, लिट्टी पे चोखा, खाते जाना है.
होने पे बिहारी ना शर्माना है.
दुनिया भर का बोझा हमको उठाना है.
होने पे बिहारी ना शर्माना है.
पूरब-पश्चिम, उत्तर -दख्खिन,
कोने- कोने की गन्दगी हमको मिटाना है.
होने पे बिहारी ना शर्माना है.
भारत माँ का कोना-कोना साफ़-स्वच्छ बनाना है
होने पे बिहारी ना शर्माना है.
दुनिया को बिहारी एक गाली सी लगे
मुझे हर एक लड़की मेरे खूबसूरत बिहार सी लगे.
RSD
जिंदगी में कोई ख्वाइश नहीं
एक ख्वाइश पे लुटा दी जिंदगी।
एक पल ही सही वो मेरी बाहों. में थी
दो घड़ी ही सही, बहुत जी ली जिंदगी।
कोई मिल जाए इस प्यास को मिटाने को
तो क्या, कहीं खो गयी जब जिंदगी।
बहुत तोडा है एक शक्श ने मुझे
पर दिल ही की आज भी मचल जाता है उसपे।
कहीं दिख जाए, मिल जाए, टकरा जाए, तो वो निकल जाता है
पर दिल है की, उसके ओझल होने तक निहारता है उसे.
ए दोस्त तू नादाँ हैं, या परेशान है
तेरी आँखे कह रही की तू बिस्क में बीमार है.
क्या है जो धीरे-धीरे तू टूट रहा?
लगता है तेरे यार का आज ही निकाह है.
सोचता है की कब, कैसे और क्यों वो बदल गयी
तू अब भी नहीं समझा, ये हुस्ने-अंदाज है.
बहुत बेचैन हो जाता हूँ की कोई तेरे करीब है
लौट आ, तेरा यार अब बहुत अमीर है.
तूने छोड़ दिया की मैं बिहारी हूँ
कम-से-कम देख लेती कितनी हसीं मेरी जमीन है.
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एक पल तेरी आँखों ने जो इशारा कर किया
उम्र भर के लिए मुझे फिर आवारा कर दिया.
दो पल की इस ख़ुशी ने फिर
ताउम्र के लिए हमें तनहा कर दिया।
कितनी मंजिले बनी थी इन लकीरों पे
उन सबसे मेरी राहों को जुदा कर दिया।
मैं लिख रहा हूँ कविता तेरे प्यार में वो बबिता
तू सुनती नहीं तो जग को सूना रहा
मैंने खरीदें चूड़ी-कंगन, तेरे पावों के प्याल
तूने पहने ही नहीं तो जग में बाँट रहा.
एक पल आँख लड़ा के, तू भूल गयी दिल लगा के
तूने पूछा भी नहीं हाले-दिल तो मैं गमे-शब् गुनगुना रहा.
मैंने सोचा था एक घर बसा के, दीवारों पे तुमको सजा के
खिलाऊंगा लिट्टी -चोखा, तू मानी नहीं तो मैं सतुआ खा रहा.
उसने इरादा कर लिया था मुझे बर्बाद करने का
मैं भी बिहारी हूँ तो गोबर, गोइंठा, खप्पर, छप्पर सब चढ़ा गए.
इश्क़ में दुआओं का, दवाओं का, और फरियादों का कोई असर नहीं होता
जानते थे हम ये सब, जानते थे हम ये सब, पर उसकी आँखों में, आदाओं पे सब भुला गए.
धुप में – ना छावं में, मिलो मुझसे गावं में
कभी पनघट, कभी पोखर, कभी खलिहान में.
शहर मज़बूरी मेरी, ना यहाँ मैं किसी के चाह में
प्यार कब पनपा है, सवंरा हैं बंदिशों और घेराव में.
ना दिल्ली, ना महाराष्ट्र में, मिलो तुम हमसे बिहार में.
उम्मीदों के समन्दर को बाँध के निकला हूँ
जब से छोड़ा है गावं, बिहार, बस भटका और सिर्फ भटका हूँ.
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उस शख्श को क्या कहें जिसकी आँखों में शराब है
दौलत से भरी दुनिया को छोड़ कर जिसे इस गरीब की चाहत है.
ये तू किसके इंतज़ार में दोपहर में बैठा है
इन राहों पे चल के कब कहाँ कोई लौटा है.
जब मैं मोहब्बत में था, तो खुल कर जंग हुई
वो अपने पे आ गयी तो मुझे रुलाने के लिए सबकी बन गयी.
कोई टिक न सका अपने ब्रह्मचर्य के पथ पे
जब वो मेनका, उर्वसी और रम्भा सी अप्सरा बन गयी.
तराशा है जिस जिस्म को मेरे आभूषणों ने
वो छनकाती हैं उन्हें किसी और की बाहों में.
मेरे दर्दे-इश्क़ का कुछ यूँ इलाज हो
टूटती चूड़ियां और दरकती लाज हो.
खली खिड़की और बंद किवाड़ के बीच
जलती एक आलाव हो.
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ना तरसा के देख मुझे, ना तड़पा के देख मुझे
ठुकराने से पहले बस संग सुला के देख मुझे।
वो रात ना फिर आएगी जो ख्व्वाबों में हैं तेरे
ना यकीं हो तो दुनिया को आजमा के फिर देख मुझे।
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इश्क़ करो तो बेवफा से, इस दर्द के बिना इश्क़ क्या
समन्दर को पता है कितने किनारो से गुजरी है दरिया।
खेलता रहूं मैं तुम्हारे वक्षों से
जैसे खेलती हैं लहरें किनारों से.
क्या तुम मुझे, मेरी जड़त्व को
लहरों सा स्वीकार करोगी?
और आओगी सर्वस त्याग कर, निर्वस्त्र मेरी आगोस में.
दीवारों पे आपकी तस्वीर लगा कर जी सकता हूँ
मगर इन साँसों का क्या जिनको आपका इंतज़ार है
इन रातों का क्या जिसमे दहकती अंगार है.
ख़्वाबों तक ही रह गयी मेरी प्यास
निगाहें मिली, बरसात भी हुई पर मिट ना सकीय ये आग
जा तुझे छोड़ रहा हूँ तेरी ही ख़ुशी के लिए
तू किसी की भी बाहों में झूल ले
पर ना मिलेगी मेरी बाहों की मिठास।
तू हरियाणवी छोरी मैं छोरा बिहार का
तेरी आँखों से हो के जाता है मेरा रास्ता बिहार का.
तू बलिष्ठ, बुलंद शेरनी, मैं बांका बिहार का
तेरी हाथ की लकीरों पे रचा है नक्शा मेरे गावं का.
तू मदमस्त, मोहनी, मृगनयनी, मैं तोमर बिहार का
तेरे वक्षों पे बसा हैं मेरा संसार प्यार का.
कितने वादे हुए, कितने इरादे बने,
कितने सपनों को थे हम पाले।
आज भी मेरे जिस्म पे उसके नाखूनों के खरोंचें हैं
सारे ही सपनों पे वो कर व्रजपात गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी.
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दौलत जो कमाई वो दौलत नहीं थी
शोहरत जो कमाई वो शोहरत नहीं थी
तुमसे मिलने के बाद मेरे रब, ये जाना
की दुनिया जो मेरी थी वो मेरी तो नहीं थी.
ऐसा निष्ठुर ऐसा निरंकुश शासक है
तो कैसे गरीब के तन पे छ्डेगी चमड़ी।
आवो महरानी। ……
जो सजाता है गुलाब जेब में
वो क्या समझेगा रेत से मोह हमारी?
आवो महरानी। ……
हमने बेकार बहा दी दुनिया खून की
जब दासता में ही रह गयी जिंदगी।
आवो महरानी। ……
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मैं हूँ बिहारी, लाखों में एक है बिहार मेरा
मुझे भाया ना कुछ जग में इस मिट्टी के सिवा।
कहीं छपरहिया, कहीं पुरवइया, कहीं बटोहिया, कहीं बिदेसिया
नाम अनेक, पर रंग सबका एक बिहार मेरा।
क्या समझेगा ये जमाना दर्द मेरा
चंद सिक्कों की खातिर मैं छोड़ आया वतन मेरा।
मेरे खेत वहीँ, बैल वहीँ, घर वहीँ, माया वहीं
पर मेरे लालच ने मुझको यहाँ बाँध रखा.
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मेरी आँखों का हैं तू ही नशा
मैं देख रहा हूँ तुझको रात-रातभर
आसमा के तले.
कोई तितली सी, उड़ कर कभी
छू गयी मेरे दिल को अपने पंखों से
मैं भुला नहीं आज तक
वो टकराई थी आके जो मेरी राहों में.
तुम्हारी जवानी एक मीठी आंच है
जिसपे रोटी पक जाए, सब्जी बन जाए
दाल-चावल सब पक जाए
फिर भी जो सुलगती हर रात है.
तुम्हारा हुस्न एक तेज़ाब है
जिसे जो छू ले, वो जलता हर एक रात है.
तुम सवरों तो बादलों में बिजली है
तुम चलों तो बलखाती हिरणी है
तुम्हारी झुकी पलके जैसे ठहरी हुई नागिन
हम तेरे करीब आने की दुआ भी करें तो क्यों ?
तेरे करीब से जजों भी गुजरा वो मयखाने में साथी है.
तुझे मांगें भी खुदा से तो क्या ?
कहहुदा खुद तुम्हे बना के फंस गगया अपनी चाल है.
तुम्हारी किताबों में मेरा एक पन्ना है
समय मिले तो पढ़ लेना, लिखा कुछ अच्छा है
तुम बैठती हो अपनी सहेलियों से लिपट कर
जो अगली पंक्ति में
हमने जाना की लड़की होना भी कितना अच्छा है
सुबह-सुबह जब तुम आती हो
खुली भींगी जुल्फों में फूल लगाकर
सौ साल की जिंदगी से एक दिन का खिलना कितना अच्छा है.
खूबसूरत है जवानी
तो तुम मेरी रानी
सहोगी मनमानी
अब रात भर, अब रात भर.
कौन कहता है हुस्ना वेवफा है
ये भी तो अरे उसकी एक अदा है.
केकरा से कही जाके ससुरा के हाल रे
सैयां अनाड़ी बारां, देवरा चालाक रे
दिन भर बइठल रहे छनि पे चढ़ के
सैया खटस कहता, देवरा इ खाट पे.
हसीं तेरी चाहत में यूँ तो नग्मे हज़ार मिलें
सबमे टुटा था पर दिल, आशिक सारे बीमार मिले
तूने लुटा एक-एक को ऐसे, जैसे उषा तिमिर को हरे
जिसने भी पुकारा तुझे वो तड़पते लाचार मिले।
तुझको भोगा जिसने, उसे क़द्र ना तेरी
जिसने क़द्र की तेरी वो बिकते बाज़ार मिले।
जब तक तू दूर है मेरी है
जब तू मेरी है तो दूर कहाँ?
तेरे नयनों में रंग बहार के है
मैं बिहार का हूँ तू चल मेरे साथ.
तू मुस्काये तो धुप खिल जाए
मैं कांधों पे लिए हल हूँ, तू चल मेरे साथ.
तेरी जुड़ों में फूल जैसे लिट्टी में घी
तुहे पीना है सतुआ तो आजा मेरे साथ.
जिस मिट्टी से राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश
तुझे बसाना हो ससुराल छपरा तो आजा मेरे साथ.
तेरे सफर की तन्हाईयाँ मंजिल पे तेरी शहनईया हैं
किस्मत से जंग में मेरे दोस्त, फतह से पहले सिर्फ और सिर्फ रुस्वाइयाँ है.
चल, सिर्फ चल बिना थकान और मंजिल के चिंता के
तेरे कदम को चूमने वाले कांटें परिछाइयाँ हैं.
जोगी तहरा से मिले आयें सांझ के
सैया रहे लागल बारां घरे रात के.
ऐसे मत जा छोड़ के हमारा गावं के
के बरसाई अब बरखा प्यार के.
अभी खा ल सखी के हाथ से दाल-भात के
आएम त खिलायेम पुआ छान के
भय, भय टांको नइखे अब देह में
कहब त भागचलेम तहरा ही साथ में.
खुदा ने लिखा सबसे महँगी मोहब्बत मेरे लिए
बस मेरी किस्मत में दौलत को लिखना भूल गया
खुदा ने तरासा उनके जिस्म को बारीकी से मेरे लिए
बस मुझको तरसना भूल गया
खुदा ने मुझे दी सीरत और उनके दिल में
सीरत की चाहत डालना भूल गया
खुदा ने बनाई शादी की लकीरें मेरे और उनके दोनों ही के हाथों में
मगर जन्नत में ये जोड़ी लिखना भूल गया.
मैं तड़पता रहा जिस प्यास को लिए
तुम उस दरिया को लिए बैठी रही
ना प्यास मिटा, ना दरिया सूखी
मोहब्बत यूँ ही अधूरी रही
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