छपरा लुटाईल बा


इहे कमरिया पे खेत कतना बिकाइल बा
देख ला हाल बाबूसाहेब के, छपरा लुटाईल बा.
जिनगी जवन रहे हरियर, उँहा अब पतझड़ आइल बा.
इहे कमरिया पे खेत कतना बिकाइल बा.

RSD


चोर मांगे चोरी से यार बलजोरी से
भतरा करता मुँहजोरी रे.
अरे केकरा से कहीं सखी
कहवाँ हाँ जाके?
रोजे मांगता हमार ढोंढ़ी रे.
अरे बैल बहे खेती में
खाके घास नादि में.
भतरा रहता चुहानी में
अरे केकरा से कहीं सखी
कहवाँ हाँ जाके?
रोजे मांगता हमार ढोंढ़ी रे.
अरे बच्चा खेले गोदी में
लइका खेले गाछी में
भतरा करता बस आँगन-दुआरी रे
अरे केकरा से कहीं सखी
कहवाँ हाँ जाके?
रोजे मांगता हमार ढोंढ़ी रे.

RSD

छपरा


खुदा तेरी चाहत का ये कैसा मिसरा है
लिखता हूँ तेरा नाम और लिख जाता छपरा है.
किस दर पे तेरे आऊं सजदा करने को
तेरे दर की कोई भी राह लूँ, वो ले जाती बस छपरा है.

RSD

बालाम परदेशी हो गए


देहिया गुलाबी करके
नयना शराबी करके
बालाम परदेशी हो गए.

मनवा के गाँठ खोल के
चिठ्ठी – आ – पाती पढ़ के
बालाम परदेशी हो गए.

अंग – अंग पे निशानी दे के
चूल्हा-चुहानी दे के
बालाम परदेशी हो गए.

मुझको बेशर्म करके
लाली और मेहँदी हर के
बालाम परदेशी हो गए.

मुझसे छुड़ा के मायका
मुझको दिला के चूड़ियाँ
बालाम परदेशी हो गए.

करवट मैं फेरूं रात भर
सुनकर देवरानी की चुहल
बालाम परदेशी हो गए.

Rifle Singh Dhurandhar

बदनाम – बेशर्म – पावन – खलिहान – खाट


ए मेरे दिलवर
मुझे प्यार करके तू
बदनाम कर दे आज-२.

फिर पाने को तुझे
ढूंढती रहूं
बेशर्म होके मैं
हर सुबहों -शाम.

मेरा रूप-रंग, यौवन,
ये साजों-श्रृंगार
छू कर इन्हें
पावन कर दे आज.

तू बरसे मुझपे
बादल बनके
मैं भींगती रहूं
सारी-सारी रात.

लूट जाने दे मुझे
खलिहान में अपने
इससे मीठी ना होगी
किसी आँगन की खाट.

Rifle Singh Dhurnahdar

सैंया जी के खेत में


सैंया जी के खेत में
लगे हैं दाने अनार के, सखी
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

चार बच्चों की अब्बा बना दी
फिर भी लगाते हैं रेस रे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

६० की मैं, पर प्यास मिटती नहीं
ऐसे रखते हैं मुझे सुलगाए के.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

हैं तो काले कौवे से वो
पर चमकती हैं उनकी देह रे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

यूँ ही नहीं हैं वो छपरा के धुरंधर
पछाड़ा है सबको इस रेत पे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

मेरी तो किस्मत फूटी, जो इनसे बंध गयी
क्या -क्या ना करतब दिखाते हैं सेज पे?
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

परमीत सिंह धुरंधर 

जहाँ मिट्टी अब बस बुतों में है


शहर अब भी दुकानों में है
गावं अब भी खलिहानों में है.
तुम जिसे ढूंढते हो
वो दिल तो किताबों में है.

तुम जाने किन हसरतों के पीछे हो
अपना आशियाना लुटा के.
उन हसरतों का किनारा नहीं
वो तो खुद मझधारों में हैं.

बरसात की चंद बूंदों से
गावं में खुशबु बिखर जाती है.
ये शहर है जहाँ मिट्टी
अब बस बुतों में है.

परमीत सिंह धुरंधर

चोली भी एक बोझ है


तन्हा – तन्हा मेरी जवानी पे
चोली भी एक बोझ है.
सखी, पोखर के इस पानी में
कहाँ मिटता जोवन का ताप है?

कोई भिजा दे संदेसा
उस अनाड़ी, निर्मोही, वैरागी Crassa को
उसकी जोगन पनघट पे
आज भी देखती उसकी राह है.

परमीत सिंह धुरंधर

न करे खर्च एक रुपया


काला – काला सैया मेरा
जैसे कोई कउआ.
दिन भर करे टर्र – टर्र
रात में चढ़ा के पउआ.

दुःख का पहाड़ टूटा है सखी
जाने क्या देख, बाबुल बाँध गए पल्ला?
मेरी भारी जवानी पे
न करे खर्च एक रुपया।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे


उनके जिस्म पे जो
ये गहने हैं
पैसों से तो सस्ते
पर पसीने से बड़े महंगे हैं.

कैसे उतार के रख दे?
वो ये गहने अपने जिस्म से
चमक में थोड़ी फीकी ही सही
मगर इसी चमक के लिए
मेरे बैल दिन – रात बहते हैं.

मेरे बैलों को कोई पशु ना कहे
हैं की उन्ही के बल पे
मेरे घर के चूल्हे जलते हैं
और उनके कर पे वस्त्र
और गहने चमकते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर