छपरा से कटिहार तक


माँ ने कहा था बचपन में,
तुम लाल मेरे हो लाखों में.
तुम्हे पा कर मैं हर्षित हुई थी,
नाचे थे पिता तुम्हारे, जब आँगन में.
गोलिया चली थीं, तलवारे उठीं थी,
छपरा से कटिहार तक.
बाँट रहे थे सप्ताह – भर, रसोगुल्ला,
बड़े -पिता तुम्हारे, कोलकत्ता में।
दादी ने चुम्मा था माथा तुम्हारा,
गिड़ – गिड़ के पीपल पे.
दादा ने फुला के सीना,
खोल दिया था खलिहान, जन – जन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खुले खेतों में मेरी रानी


मैं गलियों का हूँ शहजादा,
तू महलों की रानी।
थोड़ा इश्क़ करेंगे परदे में,
थोड़ा बे-पर्दा मेरी रानी।
शर्म – हया हैं तेरी आँखों में,
और मेरी बेशर्म जवानी।
थोड़ा इश्क़ करेंगे बंद कमरे में,
थोड़ा खुले खेतों में मेरी रानी।
मैं नहीं रुक सकता रातों का अँधेरा छाने तक,
मैं नहीं संभल सकता तेरा दिया बुझाने तक,
थोड़ा इश्क़ करेंगे अंधेरों में,
थोड़ा नहरों पे मेरी रानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो


माई कहले बारी,
तहसे हम बात ना करीं,
की तू बड़ा बदनाम बड़ा हो.
हमार माई कहले बारी,
तहके घर ले चलीं,
की ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो.
चलअ, हटअ पीछे, हमके मत छेडअ हमके,
बाबुल से पहले मांगअ ई हाथ हो.
देखअ ताहरा खातिर कंगन ले आइल बानी,
पाहिले पहनाएम ई ताहरा हाथ हो.
देखअ हाथे तक रहअ, पहुँचा मत धरअ,
हमार धड़कअता अब दिल हो.
त छोड़अ माई – बाबुल के चिंता,
अब हो जाएगअ सार खेल हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों की आस


बाहर बादलों की भीड़ हैं प्रिये,
बरस रहें हैं द्वार पे, वो नित प्रिये।
तुम वहाँ गावं में, हम यहाँ परदेश में,
प्रीत में ये कैसी रीत हैं प्रिये।
लाता हूँ रोज फूलों को, जुल्फों की तेरे याद में,
दीपक भी जलाता हूँ, तेरे मुखड़े की आभा में.
तुम चूल्हा-चौकी पे, हम लम्बी रातों में.
विरहा के ये कैसे गीत हैं प्रिये।
ओठों की लाली हम नहीं चख पाए,
आँखों के काजल हम नहीं सोंख पाए,
ना पतली कमर पे हाथ ही फेर पाए.
तुम सीने में दबाए, हम वक्षों की आस लगाए,
जीवन की ये कैसी पीर है प्रिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

These lines describe when husband is in city and his wife is in village. They have not spend quality time after marriage as her husband had to go for job. He is missing his wife as it is raining outside. So he is trying to imagine her face and her beauty. This was situation during 1970-2000, not now.

आपन गावं के चिड़िया रहनी


अइसन -वइसन खेल ए राजा,
मत खेल आ तू हमारा से.
आपन गावं के चिड़िया रहनी,
लुटले रहनी कतना खेत बाजरा के.
जाल बिछा के कतना शिकारी,
रहलन हमरा आसरा में.
अइसन घुड़की मरनी,
हाथ मल आ तारन आज तक पांजरा में.
अइसन -वइसन चाल ए राजा,
मत चल आ तू हमारा से.
आपन गावं के खिलाड़ी रहनी,
कतना के पटकनी दियारा में.
ढुका लगा के बइठल रहलन,
कतना चोर चेउंरा में.
अइसन दावं मरनी,
आज तक दर्द उठेला उनकर जियरा में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलवट – लोढ़ा


तू गावं की छोरी, मैं शहर का छोरा,
आज खेले हम सिलवट – लोढ़ा।
तू डाल दे हल्दी, मैं मार दूँ हथोड़ा,
रंग खिलेगा तब चोखा – चोखा।
खेत हैं तेरे सारे धान वाले,
उसमे उपजा रहा है गेहूं, बाप तेरा,
अकल है जिसमे बस थोड़ा – थोड़ा।
नयन तेरे हैं सागर से,
मैं भीं उसमे एक पल बिता लूँ.
समझा दे अपने घरवालों को,
ना छेड़ें इसको,
वरना नासूर बन जाएगा ये फोड़ा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नींद


कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो शब्दों में बखान नहीं होते,
थाली सोने की हो, या केले के पत्ते की,
माँ के हाथों के बिना, उसमे स्वाद नहीं होती।
हम कितना भी कमा लें पैसों – पे – पैसा,
और एक – से – एक बिस्तर लगालें,
मगर वो सुकून नहीं मिलती।
जो नींद आती थी पुवाल पे गावं में अपने,
वो अब इन हसीनाओं के गोद में नहीं मिलती।

परमीत सिंह धुरंधर

कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है


कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,
मैं सीमा का प्रहरी और तू आँगन की एक कलि है.
मैं अपने स्वार्थ वस बंधा हूँ तुझसे,
तू निस्वार्थ मन से मेरे संग कष्ट उठाती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है.
तुमने काटी हस कर बरसों एक ही साड़ी में,
और लाने को नयी पोशाकें मेरे लिए,
होली में, मेरी हाथों को पैसे थमाती है.
मैं नहीं दे पाया तुम्हे कभी भो कोई खुशियाँ,
मगर तू जिन्दी के इस साँझ पे भी,
मेरी हर खुसी पे मुस्काती है.
कभी – कभी मेरे ह्रदय में बेदना उठती है,

परमीत सिंह धुरंधर

नैहर के खेल हो


हमारा से सैया जी पुछि मत नैहर के खेल हो,
माई कहत रहली बाबुल से एक रात,
की ई लड़की त हाथ से गईल निकल हो.
गऊअन के पंडित – मुल्ला, भड़स हमर पानी,
आ दर्जिया त सिये चोलिया बिना लेले मोल हो.
हमारा से सैया जी पुछि मत नैहर के हमर चाल हो,
रोजे नापी खेता – खेती, चौरा – चौरी, एक सांस में,
अइसन रखले रहनी अहिरन के छोरा संग मेल हो.
बहिना कहलस माई से एक रात हो,
की ए माई, दिदिया त आपन बारी बड़ी बिगड़ैल हो.

परमीत सिंह धुरंधर

धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें


जब तुम खामोश हो जाती हो,
मेरी बाहों में आकर।
हर थकान मिट जाती है,
तुम्हारी साँसों को छूकर।
यूँ ही गुजरती रहें रातें,
बिना कुछ कहे – सुने।
बस तेरी झुकी पलकें हों,
और मेरी गर्म साँसे।
मुद्दत तक हो यूँ ही बरसात,
की डूब जाए हर खेत और खलिहान।
यूँ ही सुलगती रहे, ये आग चूल्हे की,
न रोटी पके और न जले,
बस धुंओं से धुंधला, तेरा जिस्म हो,
और धुंआ उठाती रहें मेरी साँसें।

परमीत सिंह धुरंधर