काँटों की शहनाई


मैं तन्हा हूँ तन्हाई में
दिल की रुसवाई में
फूल हैं दूर -दूर
मैं काँटों की शहनाई में.

बहारें राहें बदल रहीं
मुझको ही देखकर
किस्मत के तारे सारे
बैठें मुख मोड़कर।
चाँद छुप गया कहीं
सूरज प्रखर बदली में.

आँखे जिसको ढूंढती
ह्रदय जिसको चाहता
उसकी ही कामना
मैं मिट जाऊं परछाईं से.

ये अधूरापन
दिल को डस रहा मेरे
नयनों के ख्वाब भी
हैं अब विष के प्याले से.

Rifle Singh Dhurandhar

आप अंत हो अनंत के


आप अंत हो अनंत के
हे शिव, आप हो समस्त के.
ज्ञानियों के ज्ञान में
प्राणियों के प्राण में
हे शिव, आप स्वयं हो
श्री राम के ध्यान में.
आप अंत हो अनंत के
हे शिव, आप हो समस्त के.

जिसने गरल को सौंदर्य दिया
धारन कर कंठ में
और गंगा को बाँध लिया
अपने जटाओं के भंवर में.
हे शिव, आप हो समस्त में
हे शिव, आप हो समस्त के.

Rifle Singh Dhurandhar

समंदर और छपरा का धुरंधर


समंदर मेरे है काबिल कहाँ?
लचका दूँ कमर तो, वो बेताबी कहाँ?
जिस बेताबी से मेरी नजर ढूंढती
वो बेताब छपरा का धुरंधर अब कहाँ?

कैसे समझाऊं ए माई अब तुझे?
मुझे ये सब कुछ नहीं चाहिए।
आभूषणों से मेरे अंग खिलते हैं कहाँ?
बेताब ये अंग मेरे ढूंढते
वो खिलाड़ी धुरंधर अब कहाँ?

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

मैं


मुझे डुबाने के लिए ज़माने ने जब भी मशक्कत की
मैं उसकी लहरों पे और उभरा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

किनारा


मेरा इश्क़ समंदर है
और वो किनारा ढूंढती हैं.

Parmit Singh DHurandhar

सैंया जी के खेत में


सैंया जी के खेत में
लगे हैं दाने अनार के, सखी
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

चार बच्चों की अब्बा बना दी
फिर भी लगाते हैं रेस रे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

६० की मैं, पर प्यास मिटती नहीं
ऐसे रखते हैं मुझे सुलगाए के.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

हैं तो काले कौवे से वो
पर चमकती हैं उनकी देह रे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

यूँ ही नहीं हैं वो छपरा के धुरंधर
पछाड़ा है सबको इस रेत पे.
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

मेरी तो किस्मत फूटी, जो इनसे बंध गयी
क्या -क्या ना करतब दिखाते हैं सेज पे?
सैंया जी के खेत में
सैंया जी के खेत में.

परमीत सिंह धुरंधर 

राजपूतों की लहू में अब भी वही उबाल है


राजपुताना की पावन धरती से उठी अब ललकार है
यह दहाड़ है हम सिंहों की, आगे जिसके दिल्ली लाचार है.
बदल के रख देंगें ये अरंकुश, अराजक सत्ता और सत्ताधीशों को
की राजपूतों की लहू में अब भी वही महाराणा सी उबाल है.

परमीत सिंह धुरंधर 

The meaning of celebration


Flower without thorns
Streams without pebbles
Life without sickness
Eyes without crying
Difficult to find.

Success without failures
Love without pains
Morning without sun
Ocean without waves
Difficult to believe.

Rise and falls make a life
Like a husband and wife.
Without these, there is no meaning
Of celebration.

Parmit Singh Dhurandhar

Confounder


My life and my love are correlated
As seeds and watering are.
Your smiles are confounder
As sun rays are.