छपरा के जलेबी


पिया कहलन हमरा से रात में
छपरा घुमायेम तहरा के साथ में
खइया कचौड़ी गांधी चौक पे
और जलेबी, बैठ के हमरा हाथ से.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं खुद ही हूँ बिहार


मैं बिहार से नहीं, ना बिहार मुझसे है
मैं खुद ही हूँ बिहार.
भूख में- प्यास में, धुप में-छावं में
दुःख -दर्द में, हर एक एहसास में
जो मुझमे ले रहा है एक -एक पल सांस।
मैं खुद ही हूँ बिहार.

परमीत सिंह धुरंधर 

पहला पाठ इतिहास में


इतिहास में सोनू सूद जी आपका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा
मेरे अपने बच्चों को पहला पाठ आपके ही नाम का पढ़ाया जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर 

भारत के श्रवण कुमार: Sonu Sood


कहाँ छुप गइलन कन्हैया कुमार?
कहाँ फंस गइलन रविश कुमार?
कहाँ बारन, मनोज तिवारी, रवि किशन?
खेसारी लाल और बाकी दबंग सुपरस्टार।
मझधार के समय में बस सोनू सूद
ही बारन भारत के श्रवण कुमार।
मिले के चाहीं सोनू सूद जी के अब भारत रत्न
सुन ली हे मोदी जी इह हमनी के पुकार।

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा का धुरंधर


मेरे आसमा पे जितने भी सितारे हैं
सभी कह रहे की वो बिहारी हैं.
यूँ ही नहीं बना मैं छपरा का धुरंधर
मुझे बनाने वाले ये ही वो शिकारी हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं समर में महाकाल हूँ


मैं आर्यावर्त की शान हूँ
मैं सनातन की पहचान हूँ
मेरी आँखों की निकाल लो
जिव्हा को काट दो
ना मैं झुक सकता हूँ
ना मैं मिट ही सकता हूँ
क्यों की मैं तन- से-मन तक
आदि – से – अनंत तक
शुन्य – से – व्रह्माण्ड तक
मैं चौहान हूँ.
सत्रह बार तुम्हे छोड़ा है
मौत का भय मुझे क्या
जब मैंने तुम्हे जीवन दिया है
धरती से गगन तक
थलचर से नभचर तक
सूर्य से चंद्र तक
मैं समर में महाकाल हूँ.
मैं चौहान हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

सास-पतोह


बिगड़ैल हमार पीया एक नंबर के बदमाश
सासु कहस, “पतोहू तानी ठंढा कर अ आग”
हमसे ना सम्भले हमार ही जामल त
कैसे संभाली सासु राउर जामल हाँ?

पियक्कड़ हमार पीया एक नंबर के चसकल
सासु कहस, “पतोहू तानी कस के रख अ लगाम”
हमसे ना सम्भले हमार ही जामल त
कैसे संभाली सासु राउर जामल हाँ?

परमीत सिंह धुरंधर 

जब से जवान भइल बारू


जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू बोरसी के आग
अब लहकत अलाव भइल बारू।

जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू सरसो के तेल
अब ठंढा हिमताज भइल बारू।

परमीत सिंह धुरंधर

चोली रंगाई ए गोरी


बाँध अ मत ऐसे जोबना ए गोरी
हाहाकार मच गइल बा देख तहार ढोंढ़ी।
आइल बारन छपरा के धुरंधर मैदान में
त आज तहार चोलिया रंगाई ए गोरी।

आरा – बलिया से बच गइलू
मगर आ गइलू नजरिया में
माहिर छपरा के धुरंधर के
त आज छपरा में नकिया छेदाइ ए गोरी।

अभी बाली बा उमर, येही पर त चढ़ी रंग
जतना उड़ेल बारू, उड़ ला
दाना जी भर के चुग ला
त आज पंखिया तहार कटाई ये गोरी।

परमीत सिंह धुरंधर 

जब से जवान भइल बारू-2


जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू
पहिले धामिन रहलू तू
अब गेहुंअन भइल बारू।

डस अ तारु
खेता – खेता चढ़ के
खलिहान – बथान में
केंचुल छोड़तारु।

परमीत सिंह धुरंधर