जो तू जुल्फों में सुलाए रे


तेरे दो नैना गोरी, चाँद को ललचाये रे
कैसे थामें दिल धुरंधर, जब कमर तेरी बलखाये रे?
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

डाल के कजरा, छनका के पायल
जवानी के आग में, तू छपरा को झुलसाए रे.
लहरा – लहरा के तेरा आँचल, बादल को पागल बनाये रे.
छोड़ दूँ छपरा, छोड़ दू कचहरी
डाल दूँ खटिया आँगन में
जो तू जुल्फों में सुलाए रे.

परमीत सिंह धुरंधर 

सीधा सा


रात का नशा है तनहा – तनहा
किसे पुकारें, दर्द है ये पुराना सा?
खाकर लाख ठोकरें भी
दिल मेरा है अब भी सीधा सा.

परमीत सिंह धुरंधर
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गले -गुलिस्ता में


ये मिटटी मेरी है, ये अम्बर मेरा है
मगर मैं तनहा हूँ इस गले गुलिस्ता में.
ये दरिया मेरी है, ये सागर मेरा है
मगर मैं प्यासा हूँ इस गले -गुलिस्ता में.
जिसको भी चाहा, वो ही हमसे रूठा
किस – किस को मनाएं इस गले -गुलिस्ता में?
निगाहें है कातिल, अदायें हैं शातिर
कब तक बचाएं दामन इसे गले -गुलिस्ता में?

परमीत सिंह धुरंधर

भतार सिंह, लताड़ सिंह, नवजात सिंह और खलिहान सिंह


भोजपुरी भाषा की प्रबलता का प्रमाण ये है की इसमें आप किसी का
नाम भतार सिंह, लताड़ सिंह, नवजात सिंह और खलिहान सिंह रख सकते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

अंततः उन्हें कोई भाया था


खुले दिल से
अरमानों को सजाया था
कुछ टूट गए, कुछ सूख गए
मैंने दिल ही कुछ ऐसे लगाया था.

हम तन्हा रह गए
कोई शिकवा नहीं
अंततः उन्हें कोई भाया था
जिसके संग
उन्होंने परिणय-पत्र छपवाया था.

परमीत सिंह धुरंधर

सौतन के सैंटा


कहवाँ के अगिया सैया कहवाँ बुझावातारS
तरसे जोबवान हमार, सौतन के भिंगवातारS
ललुआ – भलुआ जागल बारन सन इंतजार में
तू सौतन के सैंटा बन के मेर्री क्रिसमस गावातारS।

परमीत सिंह धुरंधर

हरियाणा – छपरा -मथुरा


क्या रखा है बेकार का डराने में?
कभी आ के देखो हरियाणा में.
यहाँ से अगर निकल गए
तो आँख गराना छपरा पे.

यहाँ की लाठी तोड़ दे
वहाँ की लाठी फाड़ दे
फिर भी अगर बच गए
तो मिठाई चढ़ाना मथुरा में.

परमीत सिंह धुरंधर

लाल चोली


हमर बलमुआ चोर ह, चोरी करे रात में
आ डाल दे ला डाका, देखे चोली जे लाल रे.

परमीत सिंह धुरंधर

बिहारी


मन का बिहारी
तन का बिहारी
हारा है कब, बताओ?
जब तक है लाठी हाथों में
किसने पछाड़ा, बताओ?

हम जो उगा दे वो बंजर पे फूल
हम मिटा दे चाहे पत्थर या शूल
भोलेनाथ के सिवा
कहीं सर झुकाया तो बताओ।
मारिसस भी जाके
छपरा को भुलाया तो बताओ।

वो ले गए सोना
वो ले गए चांदी
काले पीतल को
सोना न बनाया तो बताओ।
उलझनों से कभी मुख चुराया
तो बताओ।

परमीत सिंह धुरंधर

माटी से सिंहों को गढ़ा


गुरु से बढ़कर कोई हुआ है क्या?
उसमे गुरु गोविन्द सिंह जी
जिनके नाम में ही पुण्य जुड़ा।

जब धरती हुई पतित और पुण्य, शुन्य बना
तब चाक पे माटी से सिंहों को जिसने गढ़ा.

और सौ – सौ बाजों से टकराने चोंच
एक – एक चिड़िया उड़ी
गुरु ने ऐसा कर्म का पाठ पढ़ाया.

परमीत सिंह धुरंधर