मन को साधना ही, तो साधना है


मन को साधना ही, तो साधना है
बह गए जो इश्क़ में, तो ताउम्र बहना है.
वो नजर नहीं है तेरी कामना में
वो तो माया का एक छलावा है.
धोखा तो उससे भी आगे हैं,
जब बाहों में लेके, ठोकरों में तौला है.

सच की तलाश में भटके कई,
हर जिस्म में बस एक धोखा है।
जिसे चाहा दिल से अपना बना लें,
वो ही हर बार निकला बेवफा है।
अब ना आस लगती किसी चेहरे से,
ना दिल को कोई सपना भाता है।
मन को साधना ही, तो साधना है
वरना हर चाह में बस ताउम्र बिखरना है।

हर मुस्कान में अब डर सा है,
हर क़सम के पीछे एक पर्दा है।
जिसे समझा था रूह का रिश्ता,
वो भी दिल का एक सौदा निकला है।
अब न रंज है, न कोई शिकवा,
बस खुद से मिलने का वादा है।
जिसे पाना समझा था मंज़िल कभी,
अब उसे भूल जाना इबादा है।

मन को साधना ही, तो साधना है
इश्क़ में बहना नहीं — संभलना है।

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रख देहनी सिख़ह्ऱ पे लाज के


पिया जी के प्यार में, रतिया चाँद में
रख देहनी सखी सिख़ह्ऱ पे लाज के.
पिया पगला गैलन, बैल नियर ब्यौरा गैलन
देख के हरियर-हरियर घास के.

बात-बात पे हँसलें, अँखियन से कसलें,
जइसे कंगनवा होय हुलास के।
चूनर उड़े पुरवइया ले गई,
भूल गइनी कहल बात रजवास के।

राती भर ना छोड़लें, भोर भइल सखी,
तारा देखलीं उजास के।
मनवा हियरा में होखेला गुदगुदी,
नाम लेके अपना सास के।

अब का करीं, परेम अइसन रोगवा,
न ओझा बुझाई न दवइया घास के।
सिख़ह्ऱ पे रखले लाज सखी,
सांसें गिनतानी पियास के।

चूनर उड़े पुरवइया ले गई,
भूल गइलीं बात रजवास के।
जाड़े के कुहासा में साग के गंध,
गाढ़ हो गइल सरसों के तास के।

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मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ


मैं तन्हा हूँ तन्हा तुम्हारे लिए
मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ।
मेरे नसों में है साँगा का ख़ून
मेरे दर्द की दवा ना ढूंढ।

मैं सुलगता रहा तेरी चाहत में
अब बुझने की वज़ह मत पूछ।
तेरी यादें हैं धुएँ की मानिंद,
इनमें मेरा वजूद मत ढूंढ।

हर मोड़ पे तेरी ही चर्चा रही,
कहाँ छूटे थे—अब मत पूछ।
मैं छुपा बैठा हूँ अपने आप में,
इस दिल की धड़कन मत सूंघ।

अगर जान सको तो जान लो मुझे,
हर बात की सफ़ाई मत पुछ।
मैं बिखरा हूँ उस नाम के साथ,
जिसे अब तू भी नहीं ढूंढ।

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ये वीरों की है अधूरी गूँज


मैं तन्हा हूँ तन्हा तुम्हारे लिए
मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ।
मेरे नसों में है साँगा का ख़ून,
मेरे दर्द की दवा ना ढूंढ।

मैं लड़ा अपने जज़्बातों से
जैसे सांगा ने घायल जूनून।
हर ज़ख्म में एक हल्दीघाटी है,
हर साँस में राजपूताना का जुनून।

मेरी आँखों में धूल नहीं, धुंध है,
इस इतिहास को मुझसे मत पूछ।
मैं टूटा हूँ जैसे चित्तौड़ की दीवारें,
मुझमे किले की मूरत मत ढूंढ।

वो जो पूछे हैं दिल की बातें,
उन्हें रणभूमि की राख सूंघ।
ये प्रेम नहीं कोई कविता मात्र,
ये वीरों की है अधूरी गूँज।

मैं चुप हूँ तो समझ लेना ये,
मौन भी एक शौर्य की पुँछ।
जो गिरा नहीं हारा नहीं कभी,
उसका बेटा हूँ — मत पूछ।

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वो जो आग बन गई


उसकी नज़र है जो याद, आती बहुत है
उसकी कमर है, जो आग लगाती बहुत है।
नाज़ुक बदन पे बक्षों का भार, पहले चोली,
फिर दुपट्टा, अब किताबें उठाती बहुत हैं।

शर्म वो जो समंदर डूब जाए,
भँवर वो जो भँवरा भूल जाए।
उसके रसीले अधर, वो जाम जो,
हिम्मत बढ़ाती बहुत है।

बालों की लट है, जो बादलों को लूट लाए,
काजल की रेखा, जो नींदें उड़ाए।
ज़ुल्फ़ों के साए वो जो, जिस्म ही नहीं,
परछाईं तक को बहकाती बहुत है।

चाल में नज़ाकत, निगाहों में फ़ितरत,
लफ्ज़ों में शोला, अदाओं में राहत।
वो जब भी हँसे, क़सम, मौसम, कायनात —
हर दिल को शायर बनाती बहुत है।

अब वो न ज़ंजीरें सहती है ज़ालिम,
न चौखट पे रुकती है बग़ावत की आलिम।
कसम ले कि कह दूँ, अब वो नाजुक औरत, परी या मल्लिका नहीं —
इक तूफ़ान है, जो हर सीने में उठती बहुत है।

जिस्म पे जो नज़रों की तिजारत रखे,
उन नज़रों में अब आग भरती बहुत है।
जो पूछे ‘तेरी औक़ात क्या है?’
हँस के कहे — इंकलाब करती बहुत है।

ना बिंदी, ना चूड़ी, ना परदे का डर,
अब लब पे है सच, आँखों में है नज़र।
वो पंख पसारे जो उड़ चली एक बार,
ज़मीं क्या, ये अम्बर भी जलती बहुत है।

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दहके सेजिया


गइलन पिया कलकतवा रे -२
बाली उमरिया, दहके सेजिया,
कैसे बाँधी जोवनवा रे.

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चिंतन की कटारी हो


तुम शहर की धुप में लगती बड़ी प्यारी हो
तुम प्रिये अब भी हमारी चिंतन की कटारी हो.
लट तुम्हारी बूंदों में, बूंदें तुम्हारी लट पे
प्यास हमारी बिना मिटाये, दुप्पटे को भिंगो रही हो.

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राजपुताना


रंगी है जमीन अपने लहू से कई बार
तब जानता है राजपुताना को संसार।

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नज़र तुमपे ही है


मेरी नज़र तुमपे ही है सनम
तुम हो कि, तुम्हें ही ना कोई खबर
तुम पढ़ती हो दुनिया भर की किताबें
बस मेरी ही किताबों पे नहीं तुम्हारी नज़र।

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बसे हैं बाबा दिल में


भोलेनाथ की जमीन से, शिव के आशीष से
चल पड़े हैं हम तो अपनी नजर लक्ष्य पे साधे।
ना भय कोई मन में, ना बंधन कोई चिंतन में
बसे हैं बाबा दिल में, तो पावों को बेड़ी क्या बांधे?

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