इश्क़


मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ क्यों बदले?
अंदाजे-गुरुर को.
ये उनकी चोली नहीं,
जो फिसल जाती है,
हर रात को.
जिस्म को पा लेना ही,
बुलंदियों का नाम नहीं।
वार्ना युद्ध होते हरम में,
और सुरमा पैदा होते,
हर एक रात को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ करना जरुरी है जिन्दा रहने के लिए,
जिन्दा रहना जरूरी है हुस्ने -बेवफाई समझने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर